ज़िला परिषद की मंगलवार को हुई साधारण सभा बैठक एक बार फिर सुर्खियों में आ गई।
राजसमंद. ज़िला परिषद की मंगलवार को हुई साधारण सभा बैठक एक बार फिर सुर्खियों में आ गई। लेकिन इस बार वजह योजनाओं की समीक्षा या विकास कार्यों की रूपरेखा नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों का उबलता गुस्सा और अफसरों की ‘जवाब देने की हिम्मत नहीं’ जैसी चुप्पी बनी। जिला प्रमुख रतनी देवी की अध्यक्षता में बुलाई गई यह बैठक एक ‘नियमित प्रशासनिक संवाद’ से ज़्यादा एक तूफानी जनप्रतिनिधि-प्रशासन टकराव का मंच बन गई। बैठक की शुरुआत में ही एक-एक कर इतने सवाल उछले कि पूरा सभागार मानो 'आक्रोश का अखाड़ा' बन गया। बिजली की बदहाली से लेकर जल जीवन मिशन की जमीनी सच्चाई, बजरी माफिया की मनमानी से लेकर शिलापट्टियों की राजनीति तक—हर मुद्दे पर जनप्रतिनिधियों ने ऐसी आग उगली कि अफसरों को जवाब देने के बजाय बगलें झांकनी पड़ीं।
बैठक की शुरुआत में ही जिला परिषद सदस्य ज्योति कुंवर ने मोर्चा संभालते हुए आंबा की पाल सड़क निरीक्षण का मुद्दा उठाया। उनका कहना था कि पिछली बैठक में तय निरीक्षण में न तो जनप्रतिनिधियों को बुलाया गया और न ही कोई सूचना दी गई। उन्होंने तंज कसते हुए पूछा-“क्या यह लोकतंत्र है या अफसरशाही की निजी रियासत?” इस आरोप पर कुछ सदस्यों ने तालियाँ भी बजाईं, और बहस की शुरुआत आक्रोश के साथ हुई, जो अंत तक जारी रही।
लेहरू लाल अहीर ने बताया कि रेलमगरा क्षेत्र में जेईएन की तैनाती तक नहीं है। ग्रामीण बिजली कनेक्शन के लिए महीनों भटकते हैं लेकिन समाधान नहीं मिलता। दीनदयाल गिरी बोले कि बारिश होते ही घंटों बिजली गुल हो जाती है और बहाली में चौबीस घंटे तक लग जाते हैं। विधायक दीप्ति माहेश्वरी ने तीखे तेवर दिखाते हुए कहा- "रात को बिजली चली जाती है, और आपके लाइनमैन, जेईएन, एईएन सबके फोन स्विच ऑफ! गांव वालों की गालियां हमें सुननी पड़ती हैं। ये तो हद की लापरवाही है।" अधिकारियों ने जवाब में रटा-रटाया आश्वासन दिया-“कड़ी कार्रवाई करेंगे।”
रेलमगरा प्रधान आदित्य प्रताप सिंह ने सीएचसी भवन उद्घाटन को लेकर गहरी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने बताया कि उद्घाटन कार्यक्रम में न विधायक का नाम था, न प्रधान का, न ही ज़िला परिषद सदस्य का शिलापट्ट पर केवल पार्टी के कुछ पदाधिकारियों के नाम थे। "ये तो पूरे जनादेश का अपमान है। अगर यह शिलापट्ट बदला नहीं गया, तो यह जनता की भावनाओं से खिलवाड़ होगा।"
लेहरू लाल अहीर ने एक और बड़ा हमला जल जीवन मिशन योजना पर किया। उन्होंने बताया कि यह योजना सिर्फ कागज़ों पर चल रही है। "कहीं टंकी है तो पाइप नहीं, कहीं पाइप है तो कनेक्शन नहीं, और कई जगह तो कुछ भी नहीं!"उन्होंने मेघाखेड़ा, प्रेमपुरा, मालीखेड़ा, भामाखेड़ा, सकरवास जैसे गांवों के उदाहरण देते हुए अफसरों को कठघरे में खड़ा किया। जब उन्होंने पूछा कि पूर्व स्वीकृत डीएमएफटी योजनाएं किस आधार पर रद्द की गईं, जिससे स्कूलों, मैदानों और सड़कों के कार्य रुक गए, तो अफसर खामोश हो गए।
राजसमंद के बनास नदी क्षेत्र में अवैध बजरी खनन का मुद्दा भी उठा। लेहरू लाल अहीर ने कहा "कुरज, ओड़ा, भुरवाड़ा, बड़लिया, पिपली आचार्यान जैसे गांवों में खुलेआम बजरी का अवैध खनन हो रहा है, लेकिन प्रशासन का कोई अफसर वहां झांकने तक नहीं गया।"कुछ जनप्रतिनिधियों ने प्रशासन और बजरी माफिया की मिलीभगत की ओर भी संकेत किए।
पप्पूलालसालवी ने देपुर मंडियाणा में बिजली लाइन शिफ्टिंग और पोल नहीं लगाने का मुद्दा उठाया। जब एसई बीएस शर्मा ने जवाब दिया कि ग्राम पंचायत ने खुद लेटर पर लिखकर मना किया था, तो जनप्रतिनिधियों ने दस्तावेज सामने रखते हुए पलटवार किया। "अगर पोल नहीं लगा सकते तो लाइन को अंडरग्राउंड कर दो! कब तक बहाने बनाते रहोगे?" बहस लंबी चली, लेकिन समाधान अधर में ही लटक गया।
जनप्रतिनिधि कुक सिंह, रतन कुंवर, पप्पूलाल सालवी, ग्यारसी देवी, समुद्र सिंह, गोपाललाल, टीना गहलोत आदि मौजूद रहे।