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बचपन में मां-बाप को खोया, जिन्दगी संवारने दिन में करते पढ़ाई, रात में काटते थे मार्बल टाइल्स

- गणित-विज्ञान में थे मेधावी, मगर चुनी देशसेवा की राह- नारायण के शिक्षकों की जुबानी
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बचपन में मां-बाप को खोया, जिन्दगी संवारने दिन में करते पढ़ाई, रात में काटते थे मार्बल टाइल्स

योगेश श्रीमाली @ कुंवारिया

नारायणलाल की जिन्दगी गरीब परिवार में बचपन से ही संघर्ष में गुजरी। वह छह माह के थे, तब मां लच्छू बाई गुजर गई। छह साल के हुए तो पिता मांगीलाल का साया सिर से उठ गया। दादी जमनी बाई तथा वासणी निवासी नाना प्रेमचन्द्र गुर्जर ने जैसे-तैसे पाला पोसा। बड़े भाई गोवद्र्धनलाल ने खेती-मजदूरी की। बहन संतु बाई घर के काम में मदद करती थी। नारायण पढ़ाई के मामले में शुरू से अव्वल रहे। प्राथमिक शिक्षा बिनोल में रहकर पूरी की तथा कक्षा 11वीं में गणित संकाय में कुंवारिया उमावि में तथा कक्षा १२वीं बोर्ड १९९८-९९ में कुरज उमावि से श्रेष्ठ अंकों से पास हुए। उन्हें पढ़ाने वाले शिक्षक चतुर्भुज गुर्जर, चन्द्रशेखर राजोरा, जितेन्द्र सनाढ्य बताते हैं कि नारायण पढ़ाई के मामले में सबसे अलग था। उसे गणित विषय काफी प्रिय थी तथा बोर्ड की परीक्षाओं में उसके 90 प्रतिशत से भी अधिक अंक आते थे। गणित के वरिष्ठ अध्यापक कमलेश त्रिपाठी और अन्य शिक्षक बंशीलाल बताते हैं कि गणित पढऩे की इतनी लगन थी कि खाली कालांश में वह सवाल हल करने के लिए शिक्षकों को ढूंढा करता था। त्रिपाठी तारीफ करते हैं कि पढ़ाई में मेधावी यह छात्र चाहता तो इंजीनियरिंग या कोई अन्य अच्छा जॉब चुन सकता था, मगर देशसेवा का उसमें जज्बा था। हालांकि वह हर प्रतियोगी परीक्षा देता था, लेकिन देशसेवा में जाने के बाद मुड़कर नहीं देखा। वह वॉलीबॉल का राज्य स्तरीय खिलाड़ी भी था। बचपन में संघर्ष करते हुए पढ़ाई की। दिन में स्कूल जाते थे और रात में बड़े भाई के साथ मार्बल कटर पर टाइल्स काटकर मेहनताना पाते थे। उस पैसे से पढ़ाई की और घर-खर्च चलाया।


उनकी प्रेरणा से युवा जा रहे देशसेवा में भविष्य
नारायणलाल की प्रेरणा से हाल ही में वासनी गांव के गोटूलाल गुर्जर सेना में और सुनील गुर्जर सीमा सुरक्षा बल में भर्ती हुए। इलाके में युवाओं की एक बड़ी फौज उनके निर्देशन में खुद को तैयार कर रही थी।


खरड़ की चटनी के थे कायल
नारायण पूरी तरह शाकाहारी थे तथा लोगों को शाकाहारी बनने के लिए प्रेरित करते थे। उन्होंने कभी चाय, बीड़ी, गुटखा, तम्बाकू का सेवन नहीं किया। उनके माामा वासणी निवासी चम्पालाल गुर्जर ने बताया कि उनके भांजे को गेहूं की रोटी व खरड़ पर बनी चटनी बेहद पंसद थी। सब्जियों में भिण्डी और मौसम के अनुसार फलों का सेवन करते थे। ननिहाल में जब भी आते, युवाओं व बच्चों को खेलने, कूदने तथा दौडऩे के लिए प्रेरित करते थे। अक्सर कहते थे, प्रतिदिन दौड़ लगाओ तो जीवन में कभी पीछे नहीं रहोगे।

Published on:
16 Feb 2019 06:00 am