अरावली की पर्वत श्रृ़ंखला के बीच स्थित कुंभलगढ़ किला अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। पर्यटन के क्षेत्र में इस किले ने अपनी अमिट छाप बरकरार रखी हुई है।
मधुसूदन शर्मा
राजसमंद. अरावली की पर्वत श्रृ़ंखला के बीच स्थित कुंभलगढ़ किला अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। पर्यटन के क्षेत्र में इस किले ने अपनी अमिट छाप बरकरार रखी हुई है। चीन के बाद दुनिया की दूसरी सबसे लंबी दीवार भी कुंभलगढ़ किले में ही स्थित है। जिसे "द ग्रेट वॉल ऑफ इंडिया" के नाम से पहचाना जाता है। यह कुंभलगढ़ किले को और भी खास बनाती है। यह न सिर्फ अपनी भव्यता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यहां की दीवार और किले का इतिहास भी किसी रोमांचक कहानी से कम नहीं है। ये दीवार ऐसे है जिस पर आठ घोड़े एक साथ दौड़ सकते हैं।
इसी दीवार पर से घोड़ों से निगरानी की जाती थी। इस दीवार पर 24 बुर्ज भी बनी हुई है। इस किले की ऊंचाई 1,914 मीटर (6,280 फीट) है, जो इसे एक अद्वितीय बनाती है। इसका इतिहास इतना समृद्ध है कि यह सालों से भारतीय पर्यटन स्थल के रूप में अपनी अमिट छाप छोड़ता आया है। इस किले का निर्माण महाराणा कुम्भा ने 1443 से 1458 ई. के बीच कराया था, और इस निर्माण में करीब 15 साल का समय लगा था। कुंभलगढ़ किला न सिर्फ अपनी दीवारों के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यहां की 350 से अधिक जैन मंदिरों और ऐतिहासिक स्मारकों का समूह भी पर्यटकों को आकर्षित करता है। इस किले में पहली पोल, आरेट, हतला पोल, हनुमान पोल, रामपोल, विजय पोल हैं। ये किला आरपोल तक है।
कुंभलगढ़ किला और उसकी दीवार: एक अनमोल धरोहर
कुंभलगढ़ किले की दीवार की कुल लंबाई 36 किलोमीटर है, जो इसे चीन की दीवार के बाद दुनिया की दूसरी सबसे लंबी दीवार बना देती है। लेकिन अब ये दीवार अब अस्तित्व में नहीं है। अब इस दीवार की लंबाई वर्तमान में 10.8 किमी रह गई है। ये दीवार किले की सुरक्षा के लिए बनाई गई थी। दीवार की चौड़ाई अलग-अलग स्थानों पर 15 से 25 फीट तक है, जो इसे और भी मजबूत और प्रभावशाली बनाती है।
कुंभलगढ़ किले की दीवार की निर्माण प्रक्रिया में एक दिलचस्प कहानी जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि जब दीवार के निर्माण में कई बाधाएं आ रही थीं, तो एक संत ने अपनी स्वेच्छा से बलिदान दिया। ताकि निर्माण में आ रही सभी अड़चनों को समाप्त किया जा सके। संत के बलिदान के बाद दीवार का निर्माण सुचारू रूप से जारी रहा, और उनकी याद में किले में भैरव पोल बनाया गया है।
कुंभलगढ़ किला न सिर्फ अपनी दीवार और स्मारकों के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह स्थल एक ऐतिहासिक धरोहर और वास्तुकला का बेहतरीन उदाहरण है। यहां का प्राकृतिक सौंदर्य और किले के ऊपर स्थित बादल महल तक पहुंचने के लिए पार होने वाले पोल (दरवाजे) जैसे भैरव पोल, निम्बो पोल, और पागड़ा पोल इसे और भी रोमांचक बनाते हैं। इस किले की दीवार के माध्यम से आप न केवल एक ऐतिहासिक यात्रा पर जाते हैं, बल्कि इस स्थल की अद्भुत सुंदरता का भी अनुभव करते हैं।
2007 में पर्यटन सचिव विनोद जुत्शी से कुंभलगढ़ फेस्टिवल की मांग की थी। इसके बाद उसकी स्वीकृति मिली और कुंभलगढ़ क्लासिकल डांस फेस्टिवल रखने की शर्त रखी। क्योंकि महाराणा कुंभा कला, संगीत, नटराजन नृत्य में विशेष रूचि रखते थे। तब से अब तक फेस्टिवल में क्लासिकल डांस व नृत्य होते आ रहे हैं। ये किला गौरवशाली गाथा कहता है और यश और कीर्ति फैला रहा है। इसका इतिहास गौरव गाथा को बयां करता है।
कुबेरसिंह सोलंकी, सचिव कुंभलगढ़ हैरिटेज सोसायटी