
रतलाम। दीपावली का पर्व जीवन में प्रकाश, उल्लास और नई उम्मीदों का संचार करता है। इस दिन हर घर में दीप जलाए जाते हैं, आंगन सजाए जाते हैं और मां लक्ष्मी के स्वागत में रोशनी की जाती है। लेकिन आलोट में दीपोत्सव का एक ऐसा दृश्य सामने आया, जिसने दीपावली के उत्सव को एक अलग ही भावनात्मक अर्थ दे दिया। यहां उन अपनों की याद में दीप प्रज्वलित किए गए, जिन्हें परिवार कभी इसी स्थान से अंतिम विदाई देकर लौटे थे। जिस मुक्ति धाम की चौखट पर कभी बिछड़ने का असहनीय दुख आंखों से छलका था, उसी स्थान पर शनिवार को दीपों की रोशनी के बीच प्रेम, श्रद्धा और स्मृतियों का उजाला बिखरा नजर आया। आलोट के अनादिकल्पेश्वर मुक्ति धाम में आयोजित यह दीप प्रज्वलन कार्यक्रम केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि अपनों के प्रति अटूट प्रेम और जीवनभर बने रहने वाले रिश्तों की भावनात्मक अभिव्यक्ति बन गया।
परम पूज्य संत दुर्गेश महाराज की विशिष्ट उपस्थिति में आयोजित इस कार्यक्रम ने दीपावली के उत्सव को संवेदना और आत्मीयता से जोड़ दिया। मुक्ति धाम परिसर में जब दीप प्रज्वलित किए गए तो वातावरण में एक अलग ही अनुभूति दिखाई दी। सामान्यत: दीपावली पर घरों, मंदिरों, प्रतिष्ठानों और सार्वजनिक स्थलों को रोशनी से सजाया जाता है, लेकिन यहां दीपों की लौ उन लोगों की स्मृति को समर्पित थी, जो अब परिवारों के बीच भले ही मौजूद नहीं हैं, लेकिन जिनका प्रेम और स्नेह आज भी परिजनों के जीवन का अभिन्न हिस्सा है।
मुक्ति धाम वह स्थान होता है, जहां जीवन की सबसे कठिन घड़ी में परिवार अपने प्रियजन को अंतिम विदाई देता है। यहां पहुंचने वाले प्रत्येक व्यक्ति के मन में किसी न किसी अपने की स्मृति जुड़ी होती है। किसी ने यहां माता-पिता को अंतिम विदाई दी होगी तो किसी ने जीवनसाथी, भाई, बहन, संतान अथवा परिवार के किसी अन्य सदस्य को खोने का दुख सहा होगा। ऐसे में दीपावली के अवसर पर इसी स्थान पर दीप प्रज्वलित करने की पहल अपने आप में गहरे अर्थ समेटे हुए रही।
जिस स्थान से कभी नम आंखों और भारी मन से लौटना पड़ा था, उसी स्थान पर दीप जलाकर अपनों को याद करना भावनाओं का अनूठा संगम बन गया। दीपों की लौ मानो यह संदेश दे रही थी कि किसी प्रियजन के संसार से चले जाने के बाद भी उसके साथ जुड़ा प्रेम समाप्त नहीं होता। शरीर की अनुपस्थिति रिश्तों को खत्म नहीं कर सकती। स्मृतियां, संस्कार, साथ बिताए पल और उनसे मिली सीख जीवन के हर पड़ाव पर व्यक्ति के साथ बनी रहती हैं।
दीपावली के दिन जब परिवार अपने घरों को रोशन करते हैं, तब दिवंगत परिजनों की याद भी मन के किसी कोने में जरूर दस्तक देती है। त्योहारों पर उनकी कमी और अधिक महसूस होती है। घर में होने वाली तैयारियों, पूजा-पाठ और खुशियों के बीच वे चेहरे याद आते हैं, जिनके साथ कभी यह पर्व मनाया जाता था। उनकी बातें, उनका स्नेह और त्योहारों को मनाने का उनका अंदाज स्मृतियों में फिर से जीवंत हो उठता है। आलोट के अनादिकल्पेश्वर मुक्ति धाम में दीप जलाने की पहल ने इसी भाव को सार्वजनिक अभिव्यक्ति प्रदान की।
मुक्ति धाम परिसर में प्रज्वलित प्रत्येक दीप अपने भीतर एक अलग भाव समेटे हुए था। कोई दीप माता-पिता की स्मृति का प्रतीक था तो कोई परिवार के उस सदस्य के प्रति सम्मान का, जिसकी कमी आज भी महसूस होती है। इन दीपों की रोशनी में केवल एक पर्व की चमक नहीं थी, बल्कि उन रिश्तों की गर्माहट भी थी, जो समय और परिस्थितियों से परे होते हैं। दीप की छोटी-सी लौ अंधकार को दूर करने का प्रतीक मानी जाती है। भारतीय परंपरा में दीप प्रज्वलन को शुभता, सकारात्मकता और आत्मिक प्रकाश से जोड़ा गया है। दीपावली पर दीप जलाने का अर्थ केवल घर को रोशन करना नहीं, बल्कि जीवन में आशा और विश्वास का संचार करना भी है। इसी परंपरा को एक संवेदनशील स्वरूप देते हुए मुक्ति धाम में दिवंगत आत्माओं के स्मरण में दीप प्रज्वलित किए गए।
यहां रोशनी का उद्देश्य उत्सव की सजावट भर नहीं था। यह उन लोगों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम बना, जिन्होंने अपने जीवनकाल में परिवार को प्रेम, संस्कार और अपनापन दिया। जीवन में कई रिश्ते ऐसे होते हैं, जिनका महत्व उनके साथ रहते हुए शायद पूरी तरह महसूस नहीं हो पाता, लेकिन उनके चले जाने के बाद उनकी अनुपस्थिति हर अवसर पर महसूस होती है। दीपावली जैसे पारिवारिक पर्व पर यह अनुभूति और गहरी हो जाती है। ऐसे में स्मृति में दीप जलाना केवल किसी को याद करने की औपचारिकता नहीं, बल्कि मन से जुड़ी भावनाओं को सम्मान देने का एक तरीका है। यह स्वीकार करने का भाव है कि जीवन की यात्रा में कुछ लोग भले ही साथ चलना छोड़ दें, लेकिन उनके दिए संस्कार और उनका स्नेह हमारी राह को हमेशा रोशन करते रहते हैं।
परम पूज्य संत दुर्गेश महाराज की विशिष्ट उपस्थिति में आयोजित कार्यक्रम ने इस पहल को आध्यात्मिक गरिमा प्रदान की। संतों की उपस्थिति भारतीय परंपरा में सदैव शांति, सद्भाव और आत्मिक चिंतन का माध्यम मानी जाती रही है। उनके सानिध्य में दिवंगत परिजनों के स्मरण के लिए दीप प्रज्वलित करना श्रद्धा और आध्यात्मिक भावों से जुड़ा अवसर बन गया। इस अवसर पर दुर्गेश महाराज ने कहा भारतीय दर्शन में जीवन और मृत्यु को एक निरंतर यात्रा के रूप में देखा गया है। शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा और उससे जुड़े आध्यात्मिक विचारों को सनातन परंपरा में विशेष महत्व दिया गया है। इसी दृष्टि से किसी दिवंगत व्यक्ति का स्मरण केवल उसके बिछड़ने का दुख व्यक्त करना नहीं, बल्कि उसके प्रति कृतज्ञता और सम्मान प्रकट करना भी है। परिवार के लिए वह व्यक्ति भले ही भौतिक रूप से उपस्थित न हो, लेकिन उसके साथ जुड़ी यादें जीवनभर बनी रहती हैं।
मुक्ति धाम में दीप प्रज्वलन के दौरान यही भाव प्रमुखता से दिखाई दिया। दीपों की कतारों ने परिसर को रोशन करने के साथ ही एक ऐसा संदेश दिया, जो किसी भी व्यक्ति के मन को छू सकता है। अपनों को याद करने के लिए किसी विशेष दिन या अवसर की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन दीपावली जैसे पर्व पर उनकी स्मृति में दीप जलाना एक विशेष भावनात्मक महत्व रखता है।
दीपावली को सामान्यत: खुशियों, उल्लास और समृद्धि का पर्व माना जाता है। बच्चे आतिशबाजी और मिठाइयों का आनंद लेते हैं, परिवार एक-दूसरे से मिलते हैं, घरों में पूजा होती है और हर तरफ उत्सव का माहौल रहता है। लेकिन इस उत्सव के बीच जीवन का एक पक्ष ऐसा भी है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। कई परिवार ऐसे होते हैं, जिनके लिए त्योहार किसी प्रियजन की कमी को और गहरा कर देते हैं।घर में जिस व्यक्ति के बिना कभी त्योहार की कल्पना नहीं की जाती थी, उसके न होने पर वही उत्सव अधूरा महसूस होता है। उसकी पसंद के पकवान, पूजा की परंपराएं, परिवार के साथ बिताए पल और छोटी-छोटी बातें याद आती हैं। ऐसे में खुशियों के पर्व पर स्मृतियों का आना स्वाभाविक है। आलोट में मुक्ति धाम पर दीप जलाने की पहल ने इन भावनाओं को सम्मान देने का अवसर उपलब्ध कराया। यह आयोजन इस बात का भी प्रतीक बना कि उत्सव केवल हंसी-खुशी मनाने का नाम नहीं है। उसमें संवेदनाओं, रिश्तों और कृतज्ञता के लिए भी जगह होनी चाहिए। जीवन में जिन लोगों ने हमें प्रेम दिया, जिनके कारण हमारा अस्तित्व और परिवार की परंपराएं समृद्ध हुईं, उन्हें याद करना भी उत्सव का ही एक रूप है।
समय के साथ जीवन की परिस्थितियां बदलती हैं। परिवार आगे बढ़ते हैं, नई पीढ़ियां आती हैं और जीवन अपनी गति से चलता रहता है। लेकिन कुछ यादें ऐसी होती हैं, जिन पर समय का असर नहीं पड़ता। माता-पिता का स्नेह, दादा-दादी की सीख, भाई-बहनों का साथ और जीवनसाथी के साथ बिताए पल हमेशा मन में सुरक्षित रहते हैं। यही स्मृतियां व्यक्ति को भावनात्मक मजबूती देती हैं और कठिन समय में संबल बनती हैं।
अनादिकल्पेश्वर मुक्तिधाम में प्रज्वलित दीप इन्हीं स्मृतियों के प्रतीक बने। यहां जलती लौ मानो कह रही थी कि किसी अपने के जाने से उसके साथ जुड़ी भावनाएं समाप्त नहीं होतीं। बिछड़ने का दुख अपनी जगह है, लेकिन उसके साथ बिताए जीवन के अनमोल पल भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। उन्हें याद करना और सम्मान देना रिश्तों की निरंतरता को बनाए रखने जैसा है। इस आयोजन का संदेश किसी एक परिवार या किसी एक अवसर तक सीमित नहीं रहा। यह समाज को भी एक संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देता है। त्योहारों के अवसर पर उन लोगों को भी याद किया जाना चाहिए, जो अब हमारे बीच नहीं हैं। उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए छोटे-छोटे प्रयास भी बड़े भावनात्मक अर्थ रखते हैं।
आलोट के अनादिकल्पेश्वर मुक्ति धाम में दीपावली के अवसर पर हुआ दीप प्रज्वलन इसी भावना का प्रतीक बन गया। जहां कभी अंतिम विदाई के समय आंसुओं ने माहौल को भावुक किया था, वहीं शनिवार को दीपों की रोशनी ने उसी स्थान को श्रद्धा और आत्मीयता से भर दिया। संत दुर्गेश महाराज की उपस्थिति में दिवंगत परिजनों को समर्पित यह आयोजन इस संदेश के साथ यादगार बन गया कि अपनों का साथ भले ही जीवन की एक सीमा तक हो, लेकिन उनका प्रेम, उनके संस्कार और उनकी स्मृतियां हमेशा हमारे भीतर जीवित रहती हैं। दीपावली का यह उजाला केवल मुक्ति धाम परिसर तक सीमित नहीं था, बल्कि उन हृदयों तक पहुंचा, जिनमें आज भी अपने बिछड़े परिजनों के लिए प्रेम और श्रद्धा का दीप जल रहा है।