
रतलाम। कालिका माता नवरात्र मेले में गत रात अखिल भारतीय हास्य कवि सम्मेलन में हंसी, ठहाकों और तालियों की गूंज देर रात तक सुनाई देती रही। कवियों ने राजनीतिक वादों पर ऐसे चुटीले तंज कसे कि श्रोता हंसते-हंसते लोटपोट हो गए। कहीं हिंदी की मिठास पर चुटकी ली गई, तो कहीं रोजमर्रा की जिंदगी की परेशानियों को हास्य का रंग देकर पेश किया गया। हास्य के बीच देशभक्ति, नारी शक्ति और सैनिकों के बलिदान पर सुनाई गई कविताओं ने माहौल को गंभीर और भावुक भी बनाया।
कोटा से आए कवि अर्जुन अल्हड़ ने तिरंगे की शान में कविता सुनाकर देशभक्ति का रंग जमाया। उन्होंने कहा, जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान, तिरंगा प्यारा है। इसके बाद मंच संभालने वाले लटूरी लाल ने हिंदी की मिठास पर ऐसा व्यंग्य किया कि पंडाल ठहाकों से गूंज उठा। उनकी पंक्तियां थीं, वो हिंदी के बल सारी दुनिया डोल लेता है, अंग्रेजी तो पउआ पीकर भी बोल लेता है।
वह मोदीजी को जाने नहीं देगा
रतलाम के कवि धमचक मुलथानी ने पंद्रह लाख रुपये के चुनावी वादे पर चुटकी लेते हुए मतदाता की बेचैनी को हास्य में पिरोया। उन्होंने सुनाया कि मतदाता कहता है, जब तक खाते में पंद्रह लाख नहीं आते, वह मोदीजी को जाने नहीं देगा। इस पर श्रोताओं ने जमकर ठहाके लगाए। श्रीराम के प्रति आस्था पर उनकी पंक्तियों ने माहौल को भावपूर्ण भी बनाया।
सैनिकों के बलिदान और किसानों के संघर्ष को शब्द दिए
सोनभद्र के कमलेश राजहंस ने सैनिकों के बलिदान और किसानों के संघर्ष को शब्द दिए। दिल्ली की कवयित्री रजनी सिंह अवनी ने नारी शक्ति पर ओजपूर्ण रचना सुनाकर तालियां बटोरीं। मंदसौर के मुन्ना बैटरी ने राजपूती क्षत्राणियों के शौर्य का बखान किया। मुंबई के सुनील व्यास ने पेट की आग और शहरों में गुम होती जिंदगी की पीड़ा को मार्मिक अंदाज में पेश किया, जबकि इटावा के गौरव चौहान ने शहीदों के बलिदान को देश की ताकत बताते हुए राष्ट्रप्रेम का संदेश दिया। कार्यक्रम के दौरान महापौर प्रहलाद पटेल, निगम अध्यक्ष मनीषा शर्मा, पार्षद भगत भदौरिया और धर्मेंद्र व्यास ने कवियों का सम्मान किया। हास्य, व्यंग्य और देशभक्ति से सजी प्रस्तुतियों ने मेले की सांस्कृतिक शाम को यादगार बना दिया।
वह बोला मोदी है तो मुमकिन है
रतलाम के कवि धमचक मुलथानी ने अपनी चिरपरिचित अदा में…गुदगुदाते हुए सुनाया कि…मोदी जी कह रहे हैं, ना खाऊंगा ना खाने दूंगा। मतदाता कह रहा है मोदीजी , जब तक पन्द्रह लाख खाते में नहीं आते, मैं तुमको जाने नहीं दूंगा। मैंने एक मतदाता से पूछा-तेरे खाते में पन्द्रह लाख आएंगे, क्या तुझे यकीन है, वह बोला मोदी है तो मुमकिन है। साथ ही श्रीराम लला से जोड़ते हुए कहा कि …पूरी दुनिया में अपनी अकड़ रखो, दो काम कम करोगे तो चलेगा। बस रघुनन्दन की उंगली, पकड़ रखो।
मेरे अहले वतन अपने तिरंगे की हिफाजत में
सोनभद्र से आए कमलेश राजहंस ने….मेरे अहले वतन अपने तिरंगे की हिफाजत में, झुके कंधों पे मैं इस देश का भूगोल ढोता हूं ।। मेरी औलाद खाकर गोलियां सरहद पे सोती हैं। पसीना ओढ़ कर मैं खेत की मेड़ों पे सोता हूं ।। दिल्ली से आई कवियत्री रजनीसिंह अवनी ने…कल तक घर के भीतर थी अब कदम बढऩा सीख गई। लाख रुकावट आए फिऱ भी आगे जाना सीख गई। नारी को कमजोर समझना भूल तुम्हारी हैं सुन लो, नारी तो अब सूरज से भी आँख मिलाना सीख गई ।।
राजपूती क्षत्राणियों के तेवर को क्या जानोगी
मंदसौर से आए मुन्ना बेटरी ने…राजपूती क्षत्राणियों के तेवर को क्या जानोगी। तुम महफिल की नुमाइश हो गौहर को क्या जानोगी।। आन बान और शान के खातिर जो ज्वाला में लीन हुई। दो कोड़ी की धूर्त नचनियां जौहर को क्या जानोगी।। मुंबई के कवि सुनील व्यास ने सुनाया कि अजीब सौदा है इस पेट की आग का भी यारों…। वो कमाने निकला था, और खुद ही खर्च हो गया।। गाँव के मोड़ पर बूढ़ी आँखें आज भी ताकती हैं। उन्हें क्या पता, उनका बेटा शहर की भीड़ का हिस्सा हो गया।। ईटावा से आए कवि गौरव चौहान ने ना ही किसी मज़हब न खुदाओ पे टिका है, ना तो ये सियासत की ख़ताओं पे टिका है । भारत के दुश्मनों में नहीं दम जो हिला दें। ये मुल्क शहीदों की चिताओं पे टिका है ।।