अजनबी का रात को आया फोन, इसके बाद जो हुआ, वो आंखों में ला देगा आंसू
रतलाम। देश में अधिकारी कार्य को करने के बजाए लंबित रखने में भरोसा रखते है। एेसे में जब अगर सामने वाला कम पढ़ा लिखा हो तो उसकी चप्पल टूट जाती है, लेकिन कार्य नहीं होता। लेकिन हमेशा एेसा हो, ये भी न है। समाज में बेहतर लोग भी है। ये मामला कुछ एेसा ही है। भारतीय रेलवे के पश्चिम रेलवे अंतर्गत रतलाम रेल मंडल के मंडल रेल प्रबंधक आरएन सुनकर को रात में एक अजनबी को फोन आया। फोन के बाद जो हुआ, बस आप वो इस खबर में पढे़ं।
बुधवार रात के करीब 9 बजे का समय। डीआरएम आरएन सुनकर के मोबाइल पर एक अनजान नंबर से फोन व लगातार घंटी का बजना। डीआएमएम ने फोन उठाया व हलो कहा तो उधर से आवाज, आप डीआरएम बोल रहे, जब जवाब में हां बोला गया तो कहा गया- साहब सुना है आप सब की सुने हो, इन बच्चों की भी सुन लो। इसके बाद जब बच्चों से बात हुई तो डीआरएम हैरान रहे गए। मामला ही कुछ एेसा था। गुरुवार सुबह तय समय से कुछ पहले डीआरएम कार्यालय पहुंचे व बच्चों ने जो बताया था, उस कार्य को प्राथमिकता से करने के लिए विषय से जुड़े हर अधिकारी को लगा दिया।
ये है पूरा मामला
वर्ष 2004 में महू सेक्शन में कैरेज एंड वैगन विभाग में कार्यरत राजु नाम के खलासी मृत्यु हुई थी। नियम अनुसार पत्नी आश्रित थी तो उनकी पेंशन शुरू हो गई। किस्मत की मार एेसी की 2011 में मृतक राजु की पत्नी भी नहीं रही। इसके बाद छोटे बच्चों के सामने रोजी-रोटी की समस्या हो गई। पातालपानी गांव के कुछ ग्रामीणों ने मदद की तो अधिकारियों ने एक हजार नियमों की दुहाई दे दी। इसके बाद मामला जैसा था वैसा ही रह गया।
पत्रिका में पढ़ा है मददगार हो
बुधवार रात को जब डीआीएम को अनजान का फोन आया तब यही कहा गया कि पत्रिका में अक्सर पढ़ा है आप मददगार हो। इन बच्चों की भी मदद कर दो। इसके बाद डीआरएम ने जब पूरी जानकारी ली तो हैरान रह गए। इसके बाद गुरुवार को भी अधिकारियों ने नियम आदि बताकर कार्य को रोकने की कोशिश की, लेकिन शाम तक मृतक राजु की बेटी के नाम की पेंशन के दस्तावेज बना लिए गए।
डाक से नहीं, अधिकारी को भेजो
जब पेंशन के दस्तावेज बने तो डाक से इनको भेजने की बात हुई। इस पर भी डीआरएम ने कहा दिया कि डाक आज भेजोगे, कल निकलेगी, जाने बि पहुंचेगी। एक अधिकारी को खुद गांव भेजो। बताया जाता है कि जब अधिकारी जेपीसिंह गांव पहुंचे तो बेटी कविता जिनके नाम पर दस्तावेज तैयार किए गए, वो मजदूरी करने गई हुई थी, इसलिए मिली ही नहीं। जब डीआरएम को सूचना दी गई तो डीआरएम ने तलाश करने को व ग्रामीणों की मदद लेने को कहा। इसके बाद देापहर करीब एक बजे कविता मिली।
हमारे लिए भगवान है ये साहब
बडे़ लोग हम जैसे छोटे लोग से बात करना पसंद नहीं करते, ये साहब हमारे लिए भगवान से कम नहीं है। इनसे एक बार मिलकर जरूर चरण स्पर्श करुंगी।
कविता, मृतक राजु की बेटी
इस कार्य का वेतन मिलता है
हर वो व्यक्ति जो कार्य के बदले वेतन लेता है, उसको अपना कार्य ईमानदारी से करना चाहिए। मैने वो ही किया। जिस कार्य का वेतन मिलता है वो ही कार्य किया। असल धन्यवाद तो उन अनजान शख्स को जिन्होंने ये मामला हमारे संज्ञान में लाया।
- आरएन सुनकर, मंडल रेल प्रंबधक