रतलाम

मुसलमान के लिए क्या है रोजा रखने का महत्व, यहां पढ़ें रमजान की विशेषताएं

मुसलमान के लिए क्या है रोजा रखने का महत्व, यहां पढ़ें रमजान की विशेषताएं

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May 26, 2018
ramzan ka mahatva news

रतलाम। इस समय एक तरफ हिंदू अधिक मास याने ज्येष्ठ मास में धर्म-कर्म में लगे हुए है तो दूसरी तरफ रतलाम सहित पूरे भारत व दुनिया के मुसलमान रोजा रखे हुए हैं। जब मौसम का तापमान ४० डिग्री से कहीं अधीक है, एेसे में भूखा-प्यासा रहना बड़ी बात है। रमजान का माह मुस्लिम समाज के लिए ये पवित्र माह है। इस माह पवित्र ग्रंथ कुरान उतरना शुरू हुआ था। रमजान को संयम व खुदा की इबादत का महीना बताया गया है। इस माह हर मुसलमान रोजा रखता है। ये बात मौलाना अब्दुल शाकिर ने कही।

मौलाना ने बताया कि रमजान को गैर मुस्लिम इस तरह से समझे की ये आध्यात्मिक सक्रियता का वो माह है जिसका पहला उद्दश्य व्यक्ति को अंदर से जगाना है। रोजा का मुख्य उद्देश्य भौतिक चीजों पर मनुष्य की निर्भरता को कम करना व खुद को मजबूत करना है, जिससे वह पवित्रता के उच्च दायरे में प्रवेश कर पाए।

धैर्य व सहनशीलता में लाता है रोजा

मौलाना ने कहा कि प्रकृति से रोजा धैर्य का एक अधिनियम है। धैर्य व सहनशीलता रोजा में मनुष्य को एेसी स्थिति में ले जाती है, जो उसको सर्वोच्च शक्ति के निकटता की भावना का एहसास कराता है। रोजा हर उस व्यक्ति के आध्यात्मिक क्षमता को बढ़ाता है, जो नियम से इसके कायदे का पालन करते हुए करता है। इस दौरान जो संसार के लिए बेहतर है उसको बढ़ावा देना व अपने अंदर की बुराइयों को समाप्त करने का प्रयास करना है। रोजा इसी आत्म नियंत्रण को प्राप्त का प्रयास है।

घैर्य का माह बताया है

रमजान को हजरत मोहम्मद साहब ने धैर्य का माह बताया है। इस्लाम में कामयाब जीवन जीने के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात धैर्य बताई गई है। जैसे परीक्षा में एक मुश्किल सवाल का जवाब पाने के लिए धैर्य की जरुरत होती है, उसी तरह से जीवन की मुश्किलों को हल करने के लिए धैर्य की जरुरत है। हजरत मोहम्मद साहब ने कहा था कि रमजान का माह सहानुभूति का माह है। रमजान में प्रतिदिन की जिंदगी में जो किया जाता है, उसको रोजाना की जिंदगी में लागू करना चाहिए।

जीवन में बड़ा परिवर्तन

रमजान के बाद जीवन में बड़ा परिवर्तन ये होता है कि रोजा रखने वाला जीवन की चुनौतियों के लिए तैयार हो चुका होता है। उसके दिल में किसी के लिए द्वेष, गुस्सा, बदले की भावना, असम्मान नहीं रहता। वो दूसरों की भूख व प्यास का वैसे ही सम्मान करता है जो रोजा में उसने अहसास किया था।

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Published on:
26 May 2018 03:48 pm
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