एक वक्त था, जब हर कहीं मोहल्ले और पड़ोसी शाम की रौनक हुआ करते थे। वे सिर्फ पड़ोसी नहीं, करीबी दोस्त और रिश्तेदार सरीखे हुआ करते थे।
एक वक्त था, जब हर कहीं मोहल्ले और पड़ोसी शाम की रौनक हुआ करते थे। वे सिर्फ पड़ोसी नहीं, करीबी दोस्त और रिश्तेदार सरीखे हुआ करते थे। आज के सोसायटी कल्चर में ये सब जैसे खोता जा रहा है। गनीमत है कि अभी भी कई जगह किसी न किसी रूप में पड़ोसियों वाली पुरानी संस्कृति बची हुई है। खासतौर से छोटे शहरों और कस्बों ने इसे खुद में जिंदा रख हुआ है। मानसरोवर, जयपुर के वीरेश दत्त माथुर का यह ब्लॉग पड़ोसी की अहमियत की याद दिला रहा है...
अ गर पड़ोसी अच्छा हो, तो उससे करीबी रिश्ता बन जाता है। हमें घर से बाहर जाना हो, हम बीमार हों, हमारी अनुपस्थिति में बच्चों की देखभाल हो या बाजार से कोई सामान मंगवाना हो, किसी विषय पर कुछ जानकारी जुटानी हो या बातचीत कर मन हलका करना हो। इन जरूरतों को पूरा करने में एक अच्छे पड़ोसी की बहुत अहमियत होती है। समझदार और जागरूक पड़ोसी पहले भी इंसान की जरूरत थी, आज भी है।
बल्कि आजकल नौकरी-काम के सिलसिले में हम अपने परिवार और रिश्तेदारों से दूर होते जा रहे हैं। ऐसे में पड़ोसी की अहमियत भी बढ़ती जा रही है। दूर परदेस में तो पड़ोसी ही सबसे बड़े रिश्तेदार बन गए हैं। हर सुख-दुख में वही काम आते हैं और हमसे भी वे यही अपेक्षा करते हैं। जब खास रिश्तेदार दूर हों, तो दिल बहलाने और दिल हल्का करने से लेकर विभिन्न कामों में मदद पाने तक पड़ोसी से व्यवहार काम आ रहा है। बशर्ते पड़ोसी से हमारे संबंध अच्छे हों। रिश्ते निभाना भी एक कला है। पड़ोसी से रिश्ता निभाना और भी ज्यादा कोशिश और समझदारी मांगता है।
रिश्ता बनाना आसान है, पर उसे निभाना मुश्किल काम है। लंबे समय तक रिश्ते को बनाए रखने के लिए बहुत सारी चीजों का ध्यान रखना जरूरी होता है। रिश्तों में सबसे अहम होती है गरिमा। जब तक गरिमा और पवित्रता बनी रहती है, तब तक हर रिश्ता अच्छा लगता है। जब रिश्ते से गरिमा खत्म हो जाती है, रिश्ता टूट जाता है। वह रिश्ता लंबे समय तक चलता है, जिसमें संतुलन रहता है। किसी परिचित या पड़ोसी से रिश्ते निभाते समय हमें अपनी सीमाओं का ध्यान रखना चाहिए। रिश्ते निभाना भी एक कला है। पड़ोसी से रिश्ता निभाना और भी ज्यादा कोशिश और समझदारी मांगता है।