रिसर्च के जरिए इन सवालों के जवाब ढूंढने का प्रयास किया जा रहा है, विशेषज्ञ मानते हैं कि पैरेंट्स को बच्चों के साथ ज्यादा दोस्ताना व्यवहार करना चाहिए।
अमरीका और ब्रिटेन की तरह अब भारत में भी तेजी से न्यूक्लियर परिवार की अवधारणाएं बढ़ रही हैं। ऐसे अभिभावकों के सामने बच्चें की परवरिश सबसे बड़ी चुनौती होती है। लेकिन अक्सर समझाने के बाद भी बच्चे अभिभावकों की बात नहीं सुनते। आखिर क्यों किशोर-किशोरियां और छोटे बच्चे माता-पिता की बातों पर ध्यान नहीं देते?
वे कौन-से कारक हैं जो इन्हें ऐसा करने से रोकते हैं? अलग-अलग देशों में संस्कृति और पारिवारिक व्यवस्था कैसी भी हो, परिवारों में बच्चों का ऐसा ही व्यवहार नजर आ रहा है। कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के बाल रोग चिकित्सक प्रो. नील रोजस ने बच्चों की आदतों का अध्ययन किया है। उनका कहना है कि यह बच्चे के बाहरी मस्तिष्क में चल रही प्रक्रिया के कारण होता है। जिसमें बच्चे के मस्तिष्क को यह संदेश मिलता है कि उसके आस-पास के लोगों को उसकी ज्यादा परवाह करनी चाहिए। नील के मुताबिक इस दिमागी प्रक्रिया का सही अनुपात ही तय करता है कि बच्चा हमारी बात पर ध्यान देगा या नहीं।
‘डिस्ट्रैक्टेड’ किताब की लेखिका मैगी जैक्सन का कहना है कि हमारे आस-पास के उपकरणों से भी हमारे बच्चों का संघर्ष लगातार चलता है। हम अपने स्मार्टफोन, लैपटॉप और टीवी शो में इस कदर उलझे रहते हैं कि बच्चों की ओर ध्यान ही नहीं देते। हमें तब भी किसी ईमेल या वाट्स एप मैसेज की आशंका रहती है जब यह स्विच ऑफ होते हैं। जैक्सन कहती हैं ऐसे व्यवहार का मतलब है कि आप अपने बच्चों से दूर हो रहे हैं।
ऐसे करें ध्यानाकर्षित
बच्चों के सामने हमेशा सचेत रहें। उनकी बात को तवज्जो दें। घर में गैजेट्स के इस्तेमाल की समय-सीमा तय करें। अपने बच्चों को उनके नाम से बुलाएं, उनसे नजरें मिलाकर बात कहें। बच्चों से उनकी सलाह मांगे। बिना भाषण दिए समझाएं और उनके सुझाव भी मानें।
40 फीसदी अमरीकी परिवारों में अलग-अलग भोजन करने का चलन हैं। वहीं पूरे दिन का मात्र १६ फीसदी समय ही परिवार के सदस्य एक कमरे या हॉल में होते हैं लेकिन यहां भी वो एक-दूसरे से संवाद नहीं करते। व्यस्त माता-पिता, रुटीन लाइफ और बच्चों को न सुनना भी इसकी एक बड़ी वजह है।