
बीते एक दशक में ऑनलाइन शॉपिंग ने खरीदारी का तरीका ही बदल कर रख दिया है। यही कारण है कि ये युवाओं को सबसे ज्यादा आकर्षित करता है। बड़ों के बाद अब इस सूची में बच्चे भी शामिल हो गए हैं। दरअसल, ऑनलाइन शॉपिंग में बच्चों की बढ़ती रुचि को देखते हुए कंपनियां अब उनके अनुसार ऑफर ला रही हैं। ये खरीदारों की एक नई पीढ़ी है जिसे बड़ी रिटेल कंपनियां काफी संजीदगी से ले रही हैं।
स्मार्टफोन की सुलभता और इंटरनेट की सुविधा के चलते बच्चे और किशोर पहले से कहीं ज्यादा ऑनलाइन सर्फिंग करने लगे हैं। रिटेलर्स भी मुनाफा कमाने के लिए नए बाजारों पर अपना ध्यान लगा रहे हैं। ऑनलाइन शॉपिंग ने एक फायदेमंद बाजार की संभावनाओं को सच कर दिखाया है। ऑनलाइन मार्केटिंग के जरिए अब कंपनियां अपने उत्पाद सीधे युवाओं को बेच रही हैं। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि टीवी पर विज्ञापन देकर सामान बेचने के दिन अब लद गए। इसकी बजाय कंपनियां अब स्नैपचैट, यू-ट्यूब और ऐसी ही दूसरी मोबाइल एप्स के जरिए सीधे बच्चों और किशोरों से संवाद कायम कर रही हैं।
स्कूली सत्र होता गोल्डन टाइम
ऑनलाइन शॉपिंग कंपनियों के लिए बच्चों का नया स्कूल सैशन गोल्डन पीरियड से कम नहीं होता। इस समय ये बच्चे सबसे ज्यादा शॉपिंग करते हैं। राष्ट्रीय खुदरा संघ में खुदरा और उपभोक्ता विभाग की निदेशक कैथरीन कुलेन ने कहा कि बच्चे इन दिनों फोन पर जमकर खरीदारी कर रहे हैं जिससे घर का बजट भी प्रभावित हो रहा है। इसलिए बड़े रिटेलर्स भी इन ‘छोटे ग्राहकों’ पर अब विशेष ध्यान दे रहे हंै। क्योंकि ये नन्हे ग्राहक उनके मुनाफे का एक अहम हिस्सा हैं।
बच्चों के लिए हानिकारक
कमर्शियल फ्री चाइल्डहुड कैम्पेन के निदेशक जोश गोलिन का कहना है कि व्यस्क होने के नाते हम विज्ञापनों के जाल से बच सकते हैं। लेकिन बच्चों के लिए ये बुहत मुश्किल है। जो विज्ञापन वे देख रहे हैं उसकी उन्हें समझ नहीं है। ऑफर का लालच देकर कंपनियां सीधे बच्चों के मोबाइल तक पहुंच बना रही हैं। इससे न केवल गोपनीयता के बारे में सवाल खड़े होते हैं बल्कि उन विज्ञापनों का बच्चों पर पडऩे वाले प्रभाव पर भी प्रश्नचिन्ह लगाती है।
एक सर्वे के अनुसार 10-12 साल के अमरीकी बच्चों के पास स्मार्टफोन है। यही नहीं 95 फीसदी बच्चों के पास किशोर होने तक स्मार्टफोन उपलब्ध होगा जो आने वाले समय में ऑनलाइन शॉपिंग कंपनियों के नए खरीददारों के रूझान को बताएगा।