धर्म और अध्यात्म

सृष्टि के सभी स्वर ‘ॐ’ में पिरोए हैं, इसे जानने के बाद कुछ और शेष नहीं रहता

Daily Thought Vichar Manthan : सृष्टि के सभी स्वर 'ॐ' में पिरोए हैं, इसे जानने के बाद कुछ और शेष नहीं रहता

2 min read
Nov 28, 2019
सृष्टि के सभी स्वर

ॐ कार दिव्य नाद है। यह परम संगीत है। सृष्टि के सभी स्वर इसमें पिरोए हैं। पेड़ों पर बैठे पखेरुओं का कलरव, उच्च हिम शिखरों पर छायी शान्ति, पहाड़ों से उतरते झरनों की मर्मर, वृक्षों से गुजरती हवाओं की सरसर, महासागरों में लहरों का तर्जन, आकाश में बादलों का गर्जन- सभी का सार यह ओंकार है।

ॐ कार शब्द बीज है। सभी शब्द इसी से जन्मे हैं। इसी से उन्हें जीवन मिलता है और इसी में उन्हें लय होना है। वेद ही नहीं बाइबिल भी ओम् से उपजी है। गीता और गायत्री इसी से प्रकट हुई है। इसीलिए तो वेद कहते हैं कि ओम् को जिन्होंने जान लिया, उन्हें जानने को कुछ शेष न रहा। बाइबिल भी इसी सच्चाई को दुहराती है कि प्रारम्भ में ईश्वर था, और ईश्वर शब्द के साथ और फिर उसी शब्द से सब प्रकट हुआ।

ॐ कार सृष्टि बीज है। सृष्टि की सभी ऊर्जाओं का परम स्रोत है यह। अनन्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त ऊर्जा के विभिन्न स्तर, आयाम और ऊर्जा धाराएं ओंकार से ही प्रवाहित हुई हैं। तभी तो उपनिषद् कहते हैं कि ओंकार से सब पैदा हुआ, ओंकार में सभी का जीवन है और अन्त में सब कुछ ओंकार में ही विलीन हो जाएगा। सृष्टि के सूक्ष्मतम से महाविराट् होने तक के सभी रहस्य इस ओंकार में समाए हैं।

ॐ कार ध्यान बीज है। इसके ध्यान से सभी रहस्य उजागर होते हैं। शक्ति के स्रोत उफनते हैं। यह ओंकार हममें है, तुममें है, सबमें है। पर है अभी यह बन्धन में। जब तक यह बन्धन में रहेगा। हमारे भीतर रुदन का हाहाकार मचा रहेगा। वेदनाएँ हमें सालती रहेंगी। ओंकार के बन्धन मुक्त होते ही रुदन की चीत्कार संगीत के उल्लास में बदल जाएगी। ध्यान से ही यह बन्धनमुक्ति सम्भव होती है। ध्यान से ही ओंकार का बीज अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित होता है। इस ओंकार के ध्यान से ही गायत्री का गान फूटता है। यह शास्त्र की नहीं, अनुभव की बात है।

**************

Published on:
28 Nov 2019 05:17 pm
Also Read
View All