
Grishneshwar Jyotirlinga Mandir: भारत की सनातन संस्कृति में 12 ज्योतिर्लिंगों का विशेष महत्व है, लेकिन महाराष्ट्र के वेरुल (एलोरा) में स्थित घृष्णेश्वर महादेव का इतिहास (Ghrishneshwar Jyotirlinga) और महिमा सबसे अनोखी है। यह न केवल भगवान शिव का 12वां यानी अंतिम ज्योतिर्लिंग है, बल्कि यह इंसानी ईर्ष्या पर निश्छल भक्ति की जीत का सबसे बड़ा प्रतीक भी है। विश्व प्रसिद्ध एलोरा की गुफाओं और ऐतिहासिक दौलताबाद किले के साये में बसा यह मंदिर आज भी लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का मुख्य केंद्र बना हुआ है।
शिवपुराण में वर्णित कथा के अनुसार, इस पावन भूमि पर देवगिरी पर्वत के निकट सुधर्मा नाम के एक ब्राह्मण अपनी पत्नी सुदेहा के साथ रहते थे। संतान न होने से दुखी सुदेहा ने अपने पति का विवाह अपनी सगी बहन 'घुश्मा' से करा दिया। घुश्मा परम शिवभक्त थीं और वह रोज मिट्टी के 101 शिवलिंग बनाकर पास के तालाब में विसर्जित करती थीं। महादेव की कृपा से घुश्मा को एक सुंदर पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।
यहीं से कहानी में एक खौफनाक मोड़ आया। जिस बहन ने खुद अपनी गोद हरी करने के लिए छोटी बहन की शादी कराई थी, उसी सुदेहा के मन में ईर्ष्या का जहर घुल गया। एक काली रात, सुदेहा ने सोते हुए मासूम बच्चे की बेरहमी से हत्या कर दी और उसकी लाश को उसी तालाब में फेंक दिया, जहां घुश्मा शिवलिंग विसर्जित किया करती थीं।
अगली सुबह जब घर में कोहराम मचा, बहू ने खून से सना बिस्तर देखा, तो पूरा परिवार स्तब्ध रह गया। लेकिन घुश्मा की भक्ति अडिग थी। उसने रोने-बिलखने के बजाय शांत मन से महादेव की आराधना की और रोज की तरह 101 शिवलिंग लेकर तालाब की ओर चल पड़ी। विशेष रूप से यह कथा कोटिरुद्र संहिता (Kotirudra Samhita) के उस भाग से जुड़ी है जहाँ 12 ज्योतिर्लिंगों की महिमा और घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग का वर्णन आता है।
जैसे ही घुश्मा ने शिवलिंगों को तालाब में प्रवाहित कर पीछे मुड़कर देखा, उसका बेटा मुस्कुराता हुआ उसकी तरफ चला आ रहा था। उसी क्षण साक्षात भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने सुदेहा के पाप का अंत करने के लिए त्रिशूल उठा लिया। लेकिन, धन्य थी वह मां घुश्मा ने महादेव के पैर पकड़ लिए और अपनी पापी बहन के लिए भी क्षमा मांग ली।
घुश्मा की इस दयालुता से प्रसन्न होकर भोलेनाथ ने वरदान दिया कि वे हमेशा के लिए इसी स्थान पर वास करेंगे और इस ज्योतिर्लिंग को घुश्मा के नाम पर ही 'घुश्मेश्वर' या 'घृष्णेश्वर' कहा जाएगा।
लाल पत्थरों से निर्मित 44,000 वर्ग फुट में फैला यह भव्य मंदिर वास्तुकला का एक बेजोड़ नमूना है। महाराष्ट्र में दक्षिण भारतीय शैली (द्रविड़ शैली) में बना यह मंदिर बेहद दुर्लभ माना जाता है।
इस मंदिर का इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है। 16वीं शताब्दी में क्रूर आक्रांताओं द्वारा क्षतिग्रस्त किए जाने के बाद, छत्रपति शिवाजी महाराज के दादा मालोजी राजे भोसले ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था।
इसके बाद 18वीं शताब्दी में इंदौर की पुण्यश्लोक महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने इस मंदिर को वर्तमान का भव्य और आकर्षक स्वरूप दिया। बता दें कि महारानी अहिल्याबाई ने ही काशी विश्वनाथ मंदिर का भी पुनर्निर्माण कराया था।
यदि आप भी बाबा घृष्णेश्वर के दर्शन का मन बना रहे हैं, तो इन नियमों और समय का विशेष ध्यान रखें:
| गतिविधि | समय | विशेष नोट |
| सुबह की आरती | प्रातः 05:00 बजे | मंदिर परिसर में फोटोग्राफी पूरी तरह वर्जित है। |
| दर्शन का समय | सुबह 05:30 से रात 09:00 बजे तक | दोपहर 12:00 से 01:00 बजे तक दर्शन बंद रहते हैं। |
| भोग आरती | दोपहर 12:00 बजे | गर्भगृह में पुरुषों को केवल धोती पहनकर जाने की अनुमति है। |
| शाम की आरती | रात्रि 08:00 बजे | निकटतम शहर दौलताबाद (20 किमी) और हवाई अड्डा संभाजीनगर है। |
अस्वीकरण (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। यहाँ दी गई ज्योतिष, वास्तु या धार्मिक जानकारी मान्यताओं और विभिन्न स्रोतों पर आधारित है। हम इसकी पूर्ण सटीकता या सफलता की गारंटी नहीं देते हैं। किसी भी उपाय, सलाह या विधि को अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के प्रमाणित विशेषज्ञ या विद्वान से परामर्श अवश्य लें।