पुर तीन प्रकार का होता है-आत्ममय, दैवतमय, भूतमय। इन तीनों आधारों में भीतर प्रविष्ट होने वाला प्राण पुरुष कहलाता है
यह शरीर पुर कहलाता है। पुर तीन प्रकार का होता है-आत्ममय, दैवतमय, भूतमय। इन तीनों आधारों में भीतर प्रविष्ट होने वाला प्राण पुरुष कहलाता है। क्षर, अक्षर, अव्यय तीन प्रकार का होता है। समस्त विकार क्षर पुरुष के आधार पर ही सत्तावान् हैं। जैसे मृतिका में घट की स्थिति है। स्वयंभू का ब्रह्म तप: लोक में ही अपना स्वरूप ग्रहण करता हुआ परमेष्ठी लोक तक पहुंचता है। यह बिन्दु ही अव्यय पुुरुष कहलाता है। स्पंदनों से इसका निर्माण हुआ है। यही बिन्दु स्पंदनों द्वारा स्वरूप बदलता हुआ आगे बढ़ता है। अक्षर, क्षर और स्थूल भाव तक पहुंचता है।
अव्यय पुरुष
सृष्टि में प्रथम वाक् रूप अव्यय पुरुष ही बनता है। विष्णु की नाभि से सर्वप्रथम ब्रह्मा पैदा हुए। ये प्राण रूप थे। इन्हीं के मन में इच्छा पैदा हुई-एकोहं बहुस्याम। ब्रह्म और माया दोनों ही यहां सीमित हो जाते हैं। माया यहां कला, विद्या, राग, नियति और काल रूप में परिणत हो जाती है। यही ब्रह्म का प्रथम आवरण कहा जाता है। कला से सीमित आदान-प्रदान विद्या से कर्म की विवेचना, राग से आसक्ति, काल से समय गणना और नियति से कार्य-भाव की सुदृढ़ता तय होती है। आत्मा षोडश पुरुष होता है। परा विद्या इससे सम्बन्ध रखती है। अपरा विद्या या शब्द ब्रह्म में अव्यय, अक्षर, क्षर को ही स्फोट, अक्षर और वर्ण कहते हैं। अक्षर तथा वर्ण ही स्वर तथा व्यंजन हैं। सृष्टि का विकास मूलत: इन्हीं दो धाराओं में होता है-अर्थ सृष्टि और शब्द सृष्टि। अत: एक धारा के ज्ञान से दूसरी धारा का ज्ञान सहजता से हो जाता है। दोनों ही सृष्टियां परमेष्ठी से ही शुरू होती हैं।
एक ही तत्त्व का १६ स्वरूपों में बदलने का कार्य माया द्वारा होता है। तीन प्रकार के योग द्वारा-योग, बंध, विभूति। जहां ब्रह्म की प्रधानता होती है, उसे विभूति संसर्ग कहते हैं। कर्म की प्रधानता होने पर बन्ध होता है। दोनों की समता को योग कहते हैं। जहां दो के संयोग से तीसरा नया पैदा हो और पुराने दोनों नहीं रहें, वह बन्ध है। जल और वायु के संयोग से फेन बनता है। न जल, न वायु। तृण खाने से गाय के शरीर में दूध बनता है। यह विभूति संसर्ग है।
रस की तरह बल के भी तीन उदार, समवाय तथा आसक्ति संसर्ग होते हैं। अर्थात् एक अमृत, दूसरा मृत्यु रूप होता है। ये एक-दूसरे में परिवर्तित होते रहते हैं। ब्रह्म के साथ जुड़ते ही बल में असाधारणता आ जाती है। वायु के भिन्न-भिन्न गतिभाव के बाद भी आकाश तो निर्लेप ही रहता है। आत्मा भिन्न-भिन्न विद्याओं में भोक्ता बनता है। जो भोग्य पदार्थ आत्मा के लिए उपलब्ध होते हैं, वे वृत्तिता संसर्ग से होते हैं। तीनों वृत्तिता संसर्ग कर्म सम्बन्ध आत्मा में कर्म रूप माया के कारण प्रवृत्त होते हैं।
हृदय
शरीर में हृदय आत्मा की प्रधान पीठ है। पिछले जन्म के अनुभवों को समझने का राजमार्ग है। आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक क्रियाकलापों की प्रयोगशाला है। जीवन के सारे अनुभव यहां से गुजरते हैं, मिश्रित होते हैं। और अलग-अलग धरातलों पर वितरित किए जाते हैं। वैसे तो मन का स्थान भी हृदय ही होता है, किन्तु दोनों संस्थाएं भिन्न-भिन्न हैं।
हृदय शब्द में तीन अक्षर हैं-हृ, द, य। ‘हृ’ यानी आहरण करने वाला, ‘द’ यानी खण्डन करने वाला, ‘य’ है नियमन करने वाला। अर्थात् जो शक्ति वस्तु का संग्रह करती है, लेती है, वह है ‘हृ’। जो शक्ति आए हुए पदार्थों का विसर्जन करती है, फेंकती रहती है, वह ‘द’ है। जिस नियामक शक्ति के आधार पर यह आदान-विसर्ग क्रिया प्रकान्त रहती है वह ‘यम्’ है। वेद में विसर्ग शक्ति के लिए ‘प्राणन्’ तथा आहरण शक्ति के लिए ‘अपानन’ शब्द आए हैं। जाना प्राणन्, आना अपानन। दोनों का जिस मूल बिन्दु पर नियमन है, वही ‘व्यानन’ है।
ऊर्जा का स्रोत
केन्द्र में उफान रूप ब्रह्मा का कार्य, आगति में विष्णु प्राण और गति में इन्द्र प्राण का कार्य प्रमुख होता है। हृदय अक्षर संस्था होने के कारण सूक्ष्म और कारण शरीर से भी जुड़ा रहता है। बुद्धि और मन से भी जुड़ा होता है। दृश्य-अदृश्य जगत की गतिविधियों से भी इसका सम्बन्ध रहता है। हृदय अनाहत चक्र का स्थान होने से ऊर्जा का भी स्रोत है। हृदय बाहर से ऊर्जा लेता है और शरीर में विसर्जित करता है। व्यक्ति का चित्त उसके कार्यों के दौरान भिन्न-भिन्न धरातलों पर जाता है। शारीरिक, बौद्धिक, मानसिक, आधिदैविक आदि धरातलों पर। हर स्तर पर ऊर्जाओं का स्वरूप भी भिन्न होता है। ऊर्जा के इस परिवर्तन और वितरण का केन्द्र हृदय ही होता है। यह सारा परिवर्तन हृदय की भावनाओं की गति से होता है। आवेग और आवेश भी इस ऊर्जा को प्रभावित करते हैं। लम्बे समय टिकने वाला शोक चाहे भावमय हो या वासनामय, वह हृदय कमल का शोषक होता है। हृदय कमल धीरे-धीरे सिकुड़ता हुआ सर्वथा बन्द हो जाता है। भवभूति कहते हैं-‘हृदयकमलशोषी दारुणो दीर्घशोक:।’