Garuda Purana: हिंदू धर्म में मृत्यु को केवल शरीर का अंत माना गया है, आत्मा का नहीं। यही कारण है कि हमारे धर्मग्रंथों में मृत्यु के बाद किए जाने वाले कर्मों और नियमों का विशेष महत्व बताया गया है। इन्हीं में से एक है मृत व्यक्ति के कपड़ों का उपयोग न करना । जानिए सही वजह...
Garuda Purana Niti: सनातन धर्म में मृत्यु को जीवन का अंतिम सत्य माना गया है, लेकिन धार्मिक ग्रंथों के अनुसार आत्मा कभी नष्ट नहीं होती। गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद आत्मा और उससे जुड़ी कई बातों का विस्तार से वर्णन मिलता है। इसी में मृत व्यक्ति की वस्तुओं, खासकर कपड़ों को लेकर भी महत्वपूर्ण नियम बताए गए हैं। मान्यता है कि मृतक के कपड़ों का इस्तेमाल करने से व्यक्ति पर नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव पड़ सकता है। जानिए, अगर इन्हें पहनना अशुभ माना जाता है तो इन कपड़ों का क्या करना चाहिए।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इंसान का अपने कपड़ों और निजी वस्तुओं से गहरा संबंध बन जाता है। व्यक्ति लंबे समय तक जिन वस्तुओं का इस्तेमाल करता है, उनमें उसकी भावनाएं, आदतें और ऊर्जा बस जाती है। यही वजह है कि मृत्यु के बाद भी उन वस्तुओं को सामान्य नहीं माना जाता।
गरुड़ पुराण में बताया गया है कि मृत्यु के तुरंत बाद आत्मा पूरी तरह से संसार का मोह नहीं छोड़ पाती। वह कुछ समय तक अपने परिवार, घर और प्रिय वस्तुओं के आसपास रहती है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति मृतक के कपड़े पहनता है, तो वह उस सूक्ष्म ऊर्जा से प्रभावित हो सकता है। कई लोग इसे मानसिक बेचैनी, नकारात्मक विचार या अजीब अनुभवों से भी जोड़कर देखते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि आत्मा कभी नहीं मरती, केवल शरीर नष्ट होता है। आत्मा अजर और अमर है। यही विचार गरुड़ पुराण की मान्यताओं को भी आधार देता है, जहां आत्मा और उसके मोह का वर्णन मिलता है।
धार्मिक दृष्टि से केवल कपड़े ही नहीं, बल्कि मृतक की घड़ी, बिस्तर, आभूषण और रोजमर्रा की निजी वस्तुओं का उपयोग भी तुरंत नहीं करना चाहिए। माना जाता है कि ये चीजें व्यक्ति की स्मृतियों और ऊर्जा से जुड़ी होती हैं।
धर्मशास्त्रों में मृतक के कपड़ों को दान करना सबसे शुभ माना गया है। जरूरतमंद व्यक्ति, साधु या गरीबों को ये वस्त्र दान करने से पुण्य प्राप्त होता है और मृत आत्मा की शांति के लिए भी इसे अच्छा माना जाता है। यदि परिवार भावनात्मक कारणों से कपड़े संभालकर रखना चाहता है, तो उन्हें गंगाजल से शुद्ध कर, धूप-दीप दिखाने के बाद ही सुरक्षित रखना चाहिए।