परिणाम होगा प्रभावित...
रीवा। खरीफ की बोवनी की शुरुआत में मौसम की बेरुखी के चलते किसानों को ही नहीं बल्कि कृषि विभाग और कृषि वैज्ञानिकों को भी भुगतना पड़ा है। योजनाओं और प्रयोग के बावत मॉडल खेत तैयार करने में भी देरी हुई है। जिसका असर प्रयोग पर भी पड़ेगा।
समय पर बोवनी करने की पूरी कोशिश हुई बेकार
कृषि विभाग की योजनाओं के तहत कृषि अधिकारी किसानों के खेत में बतौर प्रदर्शन दलहन, तिलहन व धान की फसल तैयार करते हैं। प्रयोग के तौर पर कृषि वैज्ञानिक व कृषि अभियांत्रिकी विभाग की ओर से भी प्रदर्शन के बावत खेत तैयार किए जाते हैं। वैसे तो अधिकारियों और वैज्ञानिकों की ओर से समय पर बोवनी करने की पूरी कोशिश की लेकिन मौसम के चलते बनी प्रतिकूल स्थिति में बोवनी करना संभव नहीं हो सका है।
अधिकारियों व वैज्ञानिकों को सताने लगी है चिंता
विभाग के अधिकारियों और कृषि विज्ञान केंद्र व कृषि महाविद्यालयों के वैज्ञानिकों को अभी से यह चिंता सताने लगी है कि बोवनी में की गई लेटलतीफी का असर उत्पादन पर नहीं पड़े। दरअसल सोयाबीन व मूंग के प्रदर्शन की खेत में बोवनी एक सप्ताह देरी से हुई है। बीज पहुंचने में लेटलतीफी के चलते धान की स्थिति भी कुछ ऐसी ही बन रही है।
सरकार का लाखों रुपए होता है खर्च
प्रदर्शन चाहे कृषि विभाग का हो या कृषि अभियांत्रिकी का या फिर कृषि विज्ञान केंद्र व कृषि महाविद्यालय का। इसमें प्रतिवर्ष लाखों रुपए खर्च होते हैं। किसानों को खाद व बीज सहित अन्य दूसरे आदान दिए जाते हैं। मॉडल खेत इसलिए तैयार किया जाता है ताकि दूसरे किसान इसे देखकर खुद तकनीकी आधारित खेती करें।
वैज्ञानिकों के प्रयोग का परिणाम होगा प्रभावित
मौसम की बेरुखी के बीच की जा रही खेती से कृषि वैज्ञानिकों व अधिकारियों का प्रयोग भी प्रभावित हो रहा है। हालांकि वैज्ञानिकों का प्रयोग जारी है। तर्क है कि हर स्थिति में परिणाम प्राप्त होना चाहिए। प्राप्त परिणाम आगे के शोध कार्यों में प्रयोग किया जा सकेगा।