रीवा

नि:शुल्क प्रवेश के लिए सीट आवंटित फिर भी छात्रों को नहीं मिल रहा दाखिला

अभिभावक हो रहे परेशान....

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Jul 25, 2018
Student not get admission in private school under RTE in Rewa

रीवा। शिक्षा अधिकार अधिनियम (आरटीइ) के तहत निजी स्कूल में नि:शुल्क प्रवेश के लिए आवेदन किया। शासन स्तर से लॉटरी सिस्टम के जरिए सीट भी एलाट हो गई। बीआरसीसी कार्यालय से सत्यापन की प्रक्रिया भी पूरी करा ली। इसके बावजूद बच्ची का दाखिला नहीं हुआ।

बड़े स्कूलों में दाखिले को लेकर हो रही आनाकानी
बात शहर के बड़े स्कूलों की कर रहे हैं। स्कूलों में प्रवेश को लेकर अभिभावक परेशान हैं। संजय नगर निवासी छात्रा अंजली इसका उदाहरण हैं। यह कई दूसरे निजी स्कूलों का भी है, जो नि:शुल्क प्रवेश के लिए बच्चों के अभिभावकों को धता पढ़ा रहे हैं।

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कलेक्टर से शिकायत पर डीपीसी को दी गई जिम्मेदारी
दरअसल, छात्रा अंजली के अभिभावक बच्ची के प्रवेश को लेकर काफी परेशान हुए। स्कूल से इंकार किए जाने के बाद अभिभावक ने कलेक्टर से गुहार लगाई। अभिभावक के मुताबिक कलेक्टर ने जिला शिक्षा केंद्र के जिला परियोजना समन्वयक को निर्देशित किया कि वह बच्ची का प्रवेश कराएं। डीपीसी की ओर से स्कूल में बात कर बच्ची को प्रवेश देने को कहा।

नियम विरूद्ध तरीके से लिखवाया कि फीस जमा करेंगे
इसके बावजूद दूसरे दिन भी अभिभावक स्कूल व डीपीसी कार्यालय के बीच चक्कर काटता रहा। डीपीसी कार्यालय के दबाव के बाद स्कूल में अंजली को दाखिला तो दे दिया लेकिन इसके लिए नियम विरूद्ध तरीके से यह लिखवाया गया कि शासन की ओर से बच्ची की फीस नहीं मिलती है तो अभिभावक स्कूल में पूरी फीस जमा करेगा।

प्रवेश प्रक्रिया में नहीं यह शपथ कराने का नियम
आरटीइ के तहत स्कूल में नि:शुल्क प्रवेश प्रक्रिया में इस तरह का कोई नियम नहीं है कि अभिभावक से ऐसा लिखाया जाए कि सरकार फीस नहीं जमा करती है तो अभिभावकों को फीस जमा करना पड़ेगा। यह बात है कि स्कूल संचालक मनमाने तरीके से प्रवेश प्रक्रिया में अपना नियम लागू कर रहे हैं।

संचालकों के आनाकानी की यह है मुख्य वजह
निजी स्कूल संचालकों की ओर से आरटीइ के तहत प्रवेश में आनाकानी करने की मुख्य वजह यह है कि बच्चे के बदले शासन से फीस के रूप में एक वर्ष में अधिकतम पांच हजार रुपए मिलने हैं। जबकि स्कूल प्रति छात्र एक वर्ष का ५० हजार रुपए से अधिक फीस वसूल करते हैं। प्रवेश देने पर प्रति छात्र हर वर्ष कक्षा आठ तक हजारों रुपए का नुकसान होता है।

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