
बीना. गणेशोत्सव को लेकर शहर में तैयारियां शुरू हो गई हैं। इसी बीच साहू समाज मंदिर में विराजित होने वाली अनोखी गणेश प्रतिमा लोगों के आकर्षण का केंद्र रहेगी। यहां पिछले 39 वर्षों से लगातार ईको फ्रेंडली गणेश प्रतिमा विराजित की जा रही हैं। इन प्रतिमाओं को बनाने का काम शहर के मूर्तिकार चौधरी अशोक साहू कर रहे हैं। इस वर्ष उन्होंने करीब पांच माह की मेहनत से 28 हजार कच्चे पुंगा, जिनका वजन लगभग 35 किलो है, से छह फीट ऊंची गणेश प्रतिमा तैयार की है।
इस वर्ष बनाई गई प्रतिमा में भगवान गणेश को शेषनाग पर विराजमान दिखाया गया है। प्रतिमा की सबसे खास बात यह है कि इसे बनाने में लकड़ी, लोहे या किसी अन्य सामग्री का सपोर्ट नहीं लिया गया है। पूरी प्रतिमा केवल पुंगा को फेविकोल से चिपकाकर तैयार की गई है। बारीकी से की गई कारीगरी के कारण प्रतिमा बेहद आकर्षक दिखाई दे रही है और इसे देखने के लिए लोगों में उत्सुकता बनी हुई है।
मूर्तिकार अशोक साहू ने बताया कि पुंगा में बारिश के मौसम में नमी आने लगती है। नमी के कारण प्रतिमा तैयार करना मुश्किल हो जाता है। इसी वजह से उन्होंने अप्रेल माह से ही इस वर्ष की प्रतिमा बनाने का काम शुरू कर दिया था। करीब पांच माह तक लगातार मेहनत करने के बाद पिछले माह प्रतिमा पूरी तरह तैयार हो गई। उन्होंने बताया कि यह उनके द्वारा बनाई गई 39 वीं ईको फ्रेंडली गणेश प्रतिमा है। ईको फ्रेंडली प्रतिमा बनाने का उद्देश्य धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश देना भी है। वह ऐसी सामग्री का उपयोग करते हैं, जिससे प्रतिमा के विसर्जन के दौरान जल प्रदूषित न हो। साथ ही पानी में रहने वाले जलीय जीवों को भी किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचे।
मूर्तिकार ने बताया कि वह पिछले कई वर्षों से गणेश प्रतिमाओं को अलग-अलग खाद्य और प्राकृतिक सामग्री से तैयार करते आ रहे हैं। पिछले वर्ष उन्होंने सोयाबीन बड़ी से गणेश प्रतिमा बनाई थी। इसके पहले चना दाल, मूंगफली, घी, नारियल, सेव, मखाने, बूंदी, लाई, ज्वार के डंठल, बेर, माचिस की तीली, मोतीचूर के लड्डू, गरी गोला, साबूदाना और कैथा जैसी सामग्री से भी गणेश प्रतिमाएं तैयार कर चुके हैं।
साहू समाज मंदिर में हर वर्ष ईको फ्रेंडली गणेश प्रतिमा की स्थापना आदर्श साहू समाज समिति द्वारा की जाती है। इस कार्य में समिति के अध्यक्ष सुरेन्द्र साहू का विशेष सहयोग रहता है। समिति द्वारा प्रतिमा को मंदिर में विधि-विधान से विराजित किया जाता है। अलग-अलग सामग्री से तैयार होने वाली इन प्रतिमाओं को देखने के लिए हर वर्ष श्रद्धालुओं में विशेष उत्सुकता रहती है।