निजी स्कूलों ने तय कर लीं दुकानें, एक स्कूल में चला रहे तीन यूनिफार्म
रेशु जैन. सागर. निजी स्कूल का पुस्तकों के साथ यूनिफॉर्म पर भी कमीशन फिक्स है। स्कूल संचालकों ने यूनिफॉर्म का ठेका अपने करीबी दुकानदारों को दे दिया है। लिहाजा अभिभावकों को महंगी पुस्तकों के बाद यूनिफॉर्म भी बाजार के दाम से दोगुने दाम में खरीदना पड़ रही है। सीबीएसई से सम्बद्ध स्कूलों ने कुछ दुकानों को यूनिफॉर्म बनाने का ठेका देकर कमीशन फिक्स कर लिया है। अभिभावकों को ६०० रुपए की यूनिफॉर्म 1२00 और 1200 रुपए की लगभग १८०० रुपए में थमाई जा रही है।
निजी स्कूलों की मनमानी यहीं नहीं रुकती। कक्षावार दुकानें तय हैं। निजी स्कूल की कक्षा १ से ५वीं तक की एक दुकान और कक्षा ५वीं से ८वीं तक की यूनिफॉर्म दूसरी दुकान पर मिल रही हैं। स्कूलों और दुकानों का कमीशन फिक्स होने के बाद टेलर्स को एक साथ यूनिफॉर्म का ऑर्डर दुकानदार देता है। लगभग 50 रुपए में एक यूनिफॉर्म सिलकर तैयार हो जाती है। अच्छा से अच्छा कपड़ा 150 रुपए मीटर में खरीदा जाता है। अभिभावकों को इसी कपड़े की यूनिफॉर्म दोगुने दामों पर बेची जा रही है।
नियमों को ठेंगा, करीबियों को ठेका, ६०० की यूनिफॉर्म १२०० रुपए में खरीदने की मजबूरी
तीन साल की जगह हर साल बदल देते हैं, निजी स्कूलों की मनमानी, प्रशासन बेखबर
५५ निजी स्कूल
हैं शहर में
११ बड़े स्कूल भी शामिल
५००००
विद्यार्थी पढ़ते हैं निजी स्कूलों में
अभिभावक बोले- निजी स्कूलों ने सप्ताह में तीन यूनिफॉर्म निर्धारित कर दी हैं
पारस विद्या विहार : स्कूल यूनिफॉर्म (जनपद मार्केट)
कॉन्वेंट : रूप शृंगार, किड्स एकेडमी : बालाजी
दीपक मेमोरियल: गौरवदीप (सिविल लाइन )
डीपीएस स्कूल : क्वॉलिटी ड्रेसेस
(न्यू एडमिशन कराने पहुंच रहे अभिभावकों को बाकायदा दुकान का नाम, पता बताया जा रहा है, वे इसलिए वहीं से खरीदने को मजबूर हैं ताकि यूनिफॉर्म में कोई गड़बड़ी न हो जाए और परेशानी न हो।)
प्रशासन नहीं कर रहा कार्रवाई
किस स्कूल के बच्चों की यूनिफॉर्म कहां
अभिभावक अजय तिवारी ने बताया कि नर्सरी के बच्चे के लिए भी दो यूनिफॉर्म खरीदनी होती हंै। एक साथ लगभग ५ हजार रुपए देने होते हैं। इसमें लगभग २ हजार की सीधे कमाई हो रही है। प्रशासन कारवाई नहीं कर रहा है।
दाखिला शुरू होते ही होने लगती है लुटाई, हर सामान के दोगुने दाम
अभिभावकों का कहना है कि दाखिला शुरू होते ही ये लुटाई शुरू हो जाती है। अब सप्ताह की तीन यूनिफॉर्म हैं। ४ से ५ हजार रुपए खर्च करने पड़े रहे हैं। वजह यह है कि इन यूनिफॉर्म में केवल लोगो लगा है। यदि फिक्स दुकान से यूनिफॉर्म नहीं खरीदकर कहीं और
से खरीद भी लेते हैं तो साथ में अन्य सामग्री नहीं मिलती है। हर सामान के दोगुने रेट हैं।
तीन साल तक नहीं बदल सकते
नियमानुसार छात्र की यूनिफॉर्म को बदलवाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है। एक छात्र तीन साल तक एक यूनिफॉर्म पहन सकता है। अभिभावकों का कहना है कि निजी स्कूल संचालक हर साल खामियां गिनाते हैं और बच्चों को नई यूनिफॉर्म लेने के लिए बाध्य करते हैं।
आधी कीमत में बाजार से तैयार करा सकते हैं
कपड़ा व्यापारी अनिल केशरवानी ने बताया कि स्कूल संचालक अपने करीबियों को यूनिफॉर्म बनाने का ठेका देते हैं। जो यूनिफॉर्म फिक्स दुकानदारों के पास मिल रही हैं, उनसे आधी कीमत में यूनिफॉर्म बाजार से तैयार करा सकते हैं।