
शास्त्रों में लिखा है कि साधुओं को खड़े होकर आहार लेना चाहिए और यदि खड़े होने में दिक्कत आने लगे तो चारों प्रकार का आहार त्याग देना चाहिए। आप लोगों को भोजन बैठकर करना चाहिए न कि खड़े होकर भले ही कोई अमृत खिलाए। वर्तमान में खड़े होकर भोजन करने का चलन बढ़ गया है यह ठीक नहीं है। यह बात मुनि विमल सागर महाराज ने बाहुबली कॉलोनी में धर्म सभा में कही। उन्होंने कहा कि आगम में ऐसा लिखा हुआ है साधुओं को बैठकर और श्रावकों को खड़े होकर के भोजन नही करना चाहिए। यह अच्छी परंपरा नहीं है। मुनिश्री ने कहा एक बार हम लोगों ने आचार्य से कहा कि हम साधु उपसंघ बना कर के आप को छोडक़र के जा रहे हैं। जीवन कैसे निर्वाह करेंगे तो आचार्यश्री ने कहा था कि आपके द्वारा किसी प्रकार की अप्रभावना न हो यही सच्ची प्रभावना होगी। मुनि ने कहा कि आज हम एक दूसरे के पीछे चले जा रहे हैं इस रीति को अपनाना ठीक नहीं है देव शास्त्र गुरु कि यदि आज्ञा नहीं है तो ऐसी दौड़ में शामिल नहीं होना चाहिए। मुनि ने कहा कि मान सम्मान के बिना कोई अमृत भी पिला रहा है तो मत पियो और कोई प्रेम से विष पिलाए तो वह अच्छा है। श्रमण धर्म और श्रावक धर्म दोनों बराबरी से चलेंगे तभी धर्म रथ चलेगा, भगवान महावीर स्वामी की प्रभावना 21000 वर्षों तक चलना है।