
Sagar News : इस बार विजयादशमी पर मध्य प्रदेश के सागर में ऊंचे से ऊंचा रावण बनाकर उसका दहन किया जा रहा है। रावण भी हर साल उसे जलाने वालों पर नजर रखता है। दशहरा पर दहन से पहले रावण अच्छाई और बुराई को टटोलने शहर भ्रमण पर निकला। काम खत्म कर घर लौटती पत्रिका टीम की उनसे मुलाकात हो गई।
लंकापति रावण से टीम ने सवाल किया- गुरु! कहां चल दए। उते मैदान में सब तैयारी हो गई और तुम इते भटक रए। रावण ने अट्टाहस किया और बोला- तुम औरें चक्कर में ने पड़ो। का, तुमोरों को मालूम नईंया, यही रात अंतिम यही रात भारी…। रावण के मुख से ये बात सुनकर टीम हतप्रभ रह गई। ढांढस बंधाते हुए पूछ लिया कि, इत्ती अच्छी बुंदेली कैसे सीख गए बड्डे। अब अंतिम रात है तो तुम सटकवै की तो नई सोच रए।
तब रावण ने कहा- छोटे! ऐसी कौनऊ बात नईंया। बस! मन बेचैन हो रओ हतो तो सोची कछु घूम फिर लएं। तीन-चार दिनन से जा भी सोच रए थे कि हमाई लंका में तो विकास भरपूर हतो। सबरै काम समय पे हो जात हते। एक पइसा की भी गड़बड़ी नईं होत हती। अब हमाई ऊंचाई बढ़ गई सो कछु ज्यादा सही से दिखान लगो है। जइसे सागर को देख रए, मनो अरबों रुपइया खरच करवै के बाद भी जो उतई ढांडौ दिखात है, जिते जब पहली बार हमे जराओ गओ हतो।
टीम को विद्वान रावण की बात में दम लगा। इसलिए उसके साथ घूमने की इच्छा जता दी और अपनी मंशा बताते हुए कहा- रावण गुरु! जरा हमें संगै ले चल के बताओ तो जिन बुराइयों के कारण तुमाए लाने हर साल बारो जात है, वे बुराइए सागर में किते दिखा रईं। लंकेश तैयार हो गए और एक छोर से सागर घूमवै को प्लान बन गओ। टीम भी भारी-भरकम रावण के साथ चल दी।
सागर की सीमा पर औद्योगिक क्षेत्र सिदगुवां पहुंचे। रावण बड्डे जमकर हंस परै। बोले- तुम औरों ने उद्योग-धंधे लगावै कछु नईं कर पाओ है। कॉन्क्लेव में निवेश की बात भई थी, लेकिन इते खाली पड़ी जगाह देख लो। अब कामकाज ने रेहे तो पढ़े-लिखे मोड़ा-मोड़ी का करहैं। उने घर और मताई-बाप को छोड़ के कौनऊ बड़े शहर जाने पडहै या इतईं फट्याने पड़है। जा सबसे बड़ी चिंता होने चइए। लेकिन तुमाए नेतन खौं अपने सिवा कछु नईं दिखात। वे औरें बीना की रिफाइनरी ऐस दिखा देत जैसे लॉलीपॉप दिखाकें फुसला रए होएं। टीम बोली- बात तो पते की है, चिंता तो सबको हैं मनो कोऊ कछु कर र्नईं रओ। बोल दो सो बुरई लग जात। रावण मुस्कराते हुए बोला- तो मान रए जा बुराई है।
रावण ने सिर घुमाया तो रात में सौंदर्यीकरण के बाद जगमगाते तालाब पर नजर पड़ी। टीम ने कहा- देखो जो काम देखवे से अच्छो लग रओ। रावण ने जवाब में कहा- पानी के लाने हाहाकार मचने है, जमीन में पानी बढ़ावे को सबसे बड़ो स्रोत तलाब है। लाखा बंजारा जो अनमोल उपहार दे गए थे, पर तुम सागर बारौं ने ऐ की कीमत ने समझी। टीम ने बताई- ऐसो नईं है, जोतो खतमई हो जातो, लेकिन कछु अच्छे अधिकारी आए सो बच गओ। शहरभर ने मिलकें सफाई करी हती, नइतर ऐ में किरकेट खेलवो शुरू हो गओ हतो। ऐ की हालत देख-देख के शहर के लोगन में भोत गुस्सा है, तलाब के टुकड़े कर दए, पूर-पूर के छोटो कर दओ, गाद-गंदगी भर डारी, ऐसे ऊथलो हो गओ। रावण बोलो- गुस्सा करवो तो बुराई है, सब मिलके कसम खाएं कि, तलाब को गंदो ने करहैं, तलाब बचावै जितनो खरचा हुइए औको हिसाब जिम्मेदारन से लओ जेहे।
तुमओरें कुर्सी के लाने तो मरतईं फिर रए। ऐसो मोह कै सागर की सत्या नाश कर बैठे। आज जाके के देखो प्रदेशभर में, 2014 बैच तक के सबई थानेदार, डीएसपी साहब अपने जेएनपीए से सीख-साख के गए हैं। कौऊ मर जात तो, बड़ो अपराध होत हतो, तो फॉरेंसिक जांच को सागरई आत हते, कायकी इतईं सबई की जांचें होत हतीं। रावण बोला- एक कुर्सी के मोह में इतने तिलमिला गए, कि जां पैदा भए, ओई हों लीलन लगे। दूसरों ने कई और तुम औरों ने मान लई। बताओ, बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज को विस्तार कैसे करहो। मर्जर की प्रक्रिया अटका दई। मेडिकल कॉलेज के टुकड़ा करहो का। कोऊ रास्ता निकार लेते तो कैथलैब, कैंसर यूनिट जैसी सुविधाएं मिल जाती, मनो सागर और पूरे संभाग की हालत बिगड़ जाए, लेकिन अपनी इच्छा हुइए तो काम करन दैहें नइतर भाड़ में जाए।
रावण की बात पर कुछ देर तो जवाब देते नहीं बना। सोलह आने सच बात थी। इसलिए कुछ पल बाद चुप्पी तोड़ते हुए कहा- तुम लंका के अधिपति यानी राजा थे, राजपाठ अच्छा था और प्रजा खुश थी, लेकिन लोभ जैसी बुराई ने सब बिगाड़ दओ। रावण की भौंहे तन गईं, थोड़ा तमतमाते हुए बोला- हमाई प्रजा तो खुश थी, सही-सही बतइयो, तुम औरें भी खुश हो का। तुमाए नेता जो आज राजा बनै फिर रए। उनमें भी लालच है और उनके पीछे फिरवै बारन को भी अपनो लोभ है। जा आजई की बात नइयां। अपने इते बहुत पेले से चलो आ रओ। सबहों अपने घर के साबने सरकारी नल चाने, दूसरो मर रओ, तो मर जान दो। रावण बोला- जिते नेतन की जमीं-जायजादें हैं, उतईं बस स्टैंड बना दओ, उतईं से बायपास निकल रओ। करोड़न रुपइया खर्च कर दओ, तब भी एक बस भी उते से नईं चल पाई। विकास के नाम पर योजनाएं अपनो क्षेत्र देखके बनवा रए। हमें जा भी पता है कि कौन ने कहां से ब्रिज घुमवा दओ और कौन ने काम अड़ा दओ। बने बनाए ब्रिज को उद्घाटन तक होन नई दे रए हते।
इतनी बात करके आगे बढ़ चले। रावण को चुप देखकर टीम ने कहा, का हो गओ बड़े। कछु तो बोलो। सागर में सड़कों के काम लगे हैं, ओरवब्रिज के काम लगे हैं। सबसे लंबे ओवरब्रिज की बात चल रही है। रावण ने इस बात पर असहज होते हुए कहा- काय, हम का पहली बार सागर खौं देख रए। बातें तो इतनी फेंकत हो तुमओरें, कै सुनवे वारे के कान फूट जाएं। सबई बस बातन के आओ। भीतर से तो ऐसो लगत है इनें, कै पूरे शहर की जमीनें, घर सबई हमाए हो जाएं। योजनाओं के पइसा पे भी आंखें गढ़ाए रैत हो। तुम औरें भी तो सब देखत हो।
सागर घूमत में हमें एकई बात अच्छी लगी। इते आदमी ज्यादा बैर नई रखत। पर जा बात, सबई पै लागू नई होत। कछु तो इतने बड़े डसेला हैं, कै उने जब भी मौका मिल है, वे तुमे काट कैहें। बैर भी गजबई के हैं। कछु नेता अलग-अलग पार्टियों से जुड़वे को नाटक करत। ऊपरे से दूसरे से बैर दिखात, पर वे ओई के पिटू आएं। रावण बोला- इतनी अती हमें पता चली हे। अपने सामने कौनऊ को कछु नई समझत। एक मंच पर बैठवे बारै भी अपने एक-दूसरे को रायता बगरावै में लगे रैत हैं। तुम औरे पैंले इन बुराइयन खो बार लो, सो हम अपने आप बर जैहें, नईं तो हर साल बारत रैइयो हो हम जै के तई बने रे हैं।
आगे बढ़ते हुए रावण से पुष्पक विमान के बारे में पूछा तो वो आंखे तरेरने लगा। टीम ने कहा- बड्डे अगर विमान ले आते तो हमोरे भी देख लेते। रावण बोला- अब हमाओ मो ने खुलवाओ। सागर में पुष्पक विमान का तुमाई मूढ़ पे उतारते। उड़न खटोलना अबे तो सागर में नइयां। तुमोरे हवाई अड्डा को झुनझुना बजात रइयो। ढाना हवाई पट्टी खों हवाई अड्डा बना देते और नई बना पा रए तो दूसरी जगह ढूंढ लेते। लेकिन ढाना में बनो तो उनै फायदा, इनै नुकसान। बस एई में लगे रइयो। सोच के देखो। हवाई अड्डा हो जाए तो सागर की तरक्की को रास्ता खुल जाए। टीम बोली- मान तो सबई गए हते…। इससे आगे कुछ बोलते उससे पहले रावण ने कहा- हमें तो पता चली है कि, नेतन ने टांग अड़ा दई। अंदरूनी लड़त रैत है, जलनखोरी की। कई तो ऐसई हैं, के एक-दूसरे को मो तक नई देखत। ऐसई-बेसई बुराई नइयां, तुम खुद को जला-जला के सुका ले हो, ऐई में मर जे हो, छोड़ई दो ईहों, तबई सुखई से रे पे हो।
घूमत-घूमत रावण महाराज पुराने आरटीओ दफ्तर (इनक्यूबेशन सेंटर) के इते रुक गए। कहन लगे, जो काए के लाने बनाओ। बनावे के पैलें का सोची नईं हती। तुमोंरे ऐसई पैइसा मिटात हो। ऐसई गौर बब्बा के बंगला के न बाईचारों के लाने बनाओ शी-लाउंज आज तक खुलो नई देखो। टीम ने उनकी बात पर सहमति का सिर हिलाया। रावण बोला- तुमाए इते जैसे इंजीनियर, दुनिया में ने हुइएं। बताओ डिवाइडर के बाजू में कैमरा को पोल खड़ो कर दओ तो। मछरियों के लाने एक करोड़ का बाजार बनाओ तो, दसई साल हो गए, पर एक भी आदमी उते नई गओ। राहतगढ़ रेलवे ट्रैक पे जो ब्रिज बनाओ है, औकी इंजीनियरिंग पे कछु बोलो तो दही जम जात। हम तो रावण हैं और भगवान राम के हाथों मुक्ति पाई, लेकिन अज्ञानी बैठ के हमें हर साल जलात हैं, उनको तो भगवान बुद्धि दें।
सबेरा होवै बारो हतो तो रावण महाराज से कई के अब हमें काम पे जाने हैं। मनो आठ बुराई तो तुमने ढूंढ लईं, लेकिन नौवीं-दसवीं बुराई ईष्र्या और अंहकार तो बता नई पाए। इस बार रावण हंसई परो, और कहन लगो, तुम सागर बारौं ने जा अच्छी बात है कि सबरी बुराई देखवे के बाद भी दूसरन से पूछत फिरत हो। तुमाए नेतन हो लगत है, वे जो कै रए बोई सब सई है। ऐसे घमंड कौनऊ को नई चलो। नेतन के छर्रा-कटोरी की तो कइओ का। कौऊ हों तुमाई बातें अच्छी नई लग रईं, तो ऊपे पुलिस से मुकदमा दर्ज करवा देहो। जिन नेतन खौं तुमने सब कछु सौंप रखो है, राजा जैसो बनाके पांछे फिरत हो, भइया-बड्डे-मालक और न जाने का-का कहत हो, उनमें तो देखो कूट-कूटके अहंकार भरो है। अगर जै अहंकार छोड़के संगै आ जाते तो सागर में कछु कमी ने रह जाती। ईरखा (ईष्र्या) और अहंकार छूट जाए, ऐसी प्रार्थना करो और जाओ, ई बार भगवान श्रीराम से कइयो के हमाए संगै एक तीर इनके अहंकार को खतम करवै चला दएं। तबई सागर को बेड़ा पार हुइए। टीम ने कहा- गुरु! तुमने तो आंखें खोल दईं। फिर रावण से जैराम जी बोलके अच्छाई की जीत की प्रार्थना के साथ वापसी की गेल धरी।