
Gulab Kothari speech Stree Deh Se Aage: स्त्री को केवल परिवार की धुरी मानना उसके व्यापक स्वरूप को सीमित करना है। वह संस्कार, चेतना और आने वाली पीढ़ियों के निर्माण की आधारशिला है। संतान को मनुष्य बनाने की प्रक्रिया मां से शुरू होती है और उसके दिए संस्कार आगे चलकर समाज और राष्ट्र की दिशा तय करते हैं। इसलिए बेटियों को केवल परिवार का हिस्सा नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र निर्माण की महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में देखना चाहिए। यह विचार पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने बुधवार को पश्चिमी उत्तर प्रदेश प्रवास के दौरान भगवानपुर स्थित क्वांटम विश्वविद्यालय में ‘स्त्री : देह से आगे’ विषय पर आयोजित विवेचन कार्यक्रम में व्यक्त किए।
कार्यक्रम में कोठारी ने कहा कि भारतीय चिंतन ने जीवन को केवल बाहरी रूप में नहीं, बल्कि उसकी गहराई और समग्रता में समझने का प्रयास किया है। स्त्री परिवार और आने वाली पीढ़ियों को लेकर जिस संवेदना और दृष्टि से सोचती है, वह उसकी विशिष्ट प्रकृति का हिस्सा है। प्रकृति ने उसे ममता, प्रेम, पोषण और निर्माण की विशेष क्षमता दी है। यही गुण उसे परिवार से आगे समाज की दिशा प्रभावित करने वाली शक्ति बनाते हैं।
कार्यक्रम की शुरुआत विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. विवेक कुमार के स्वागत उद्बोधन से हुई। कार्यक्रम में दौरान कोठारी ने संबोधन के बाद छात्राओं एवं फ़ेकल्टी के मन में उपजे प्रश्नों के भी खुलकर जवाब दिए।
कोठारी ने कहा कि स्त्री केवल रूप या शरीर नहीं, बल्कि चेतना का स्वरूप है। वह विचारों को जन्म देती है, संस्कारों को विकसित करती है और भविष्य को आकार देती है। उसकी शक्ति शरीर से आगे मन, बुद्धि और आत्मा की गहराइयों में निहित है। समस्या तब पैदा होती है, जब स्त्री के इस व्यापक अस्तित्व को समझने के बजाय उसकी पहचान केवल देह तक सीमित कर दी जाती है।
उन्होंने कहा कि भारतीय चिंतन में कर्म और संस्कारों की अवधारणा महत्वपूर्ण रही है। मां संतान के व्यवहार, स्वभाव और संभावनाओं को जिस गहराई से समझती है, उसे देखते हुए उसे ‘त्रिकाल दर्शिका’ के रूप में भी देखा जा सकता है। संतान को मनुष्य बनाने का पहला संस्कार घर और विशेष रूप से मां से मिलता है।
कोठारी ने कहा कि शिक्षा से मिलने वाला ज्ञान मुख्यतः बाहरी जगत से जुड़ा होता है, जबकि जीवन के भीतर के संस्कार परिवार से आते हैं। स्त्री के स्वरूप में वात्सल्य, माधुर्य, पोषण और निर्माण की शक्तियां समाहित हैं। वह परिवार में रिश्तों को जोड़ती है और अगली पीढ़ी को जीवन के मूल्यों से परिचित कराती है।
उन्होंने कहा कि गर्भ में आने वाले जीव के संस्कारों और उसकी प्रकृति को समझकर उसे मानव जीवन के योग्य बनाना स्त्री की महत्वपूर्ण भूमिका है। पशुता से मानवता की ओर ले जाने वाला यह परिष्कार ही स्त्री की दिव्यता का बड़ा स्वरूप है।
स्त्री की मन को समझने की क्षमता का उल्लेख करते हुए कोठारी ने अभिमन्यु का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में यह अवधारणा रही है कि गर्भस्थ शिशु तक भी संस्कार और ज्ञान पहुंच सकते हैं। गर्भाधान के साथ ही मां अपने भीतर एक नए जीवन की उपस्थिति अनुभव करने लगती है। यह प्रकृति की ओर से स्त्री को मिली विशिष्ट शक्ति है।
उन्होंने कहा कि पुरुष के व्यक्तित्व और उसकी शक्ति के निर्माण में भी स्त्री की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन इस पक्ष को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। ऐसे में महिला सशक्तिकरण की चर्चा को केवल बाहरी स्वतंत्रता तक सीमित करना पर्याप्त नहीं है।
कोठारी ने कहा कि विवाह के बाद स्त्री की भूमिका केवल पत्नी तक सीमित नहीं रहती। उसके साथ पूरे परिवार की जिम्मेदारियां और रिश्ते जुड़ते जाते हैं। परिवार के रिश्तों को जोड़ना, उनका पोषण करना और अगली पीढ़ी को संस्कार देना उसके सशक्त स्वरूप का हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि महिला सशक्तिकरण को केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता या बाहरी स्वतंत्रता के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। इसमें संस्कार, चेतना, निर्णय की क्षमता और परिवार व समाज को दिशा देने की शक्ति भी शामिल है।
कोठारी ने कहा कि जीवन में सुख के लिए मन को मजबूत बनाना जरूरी है। मन ही व्यक्ति की वास्तविक शक्ति है। मां और दादी जैसे पारिवारिक संबंधों के साथ संवाद केवल समस्याओं को साझा करने तक सीमित नहीं होता, बल्कि उनसे जीवन को समझने की दृष्टि भी मिलती है।
उन्होंने कहा कि परिवार में पीढ़ियों के बीच संवाद और संस्कारों का आदान-प्रदान व्यक्ति को जीवन के अनुभवों से जोड़ता है। यही प्रक्रिया उसे केवल ज्ञानवान नहीं, बल्कि जीवन को समझने वाला मनुष्य बनाने में मदद करती है।
ममता और पोषण : आने वाली पीढ़ी के पोषण और संवर्धन की विशिष्ट क्षमता।
संस्कार की पहली पाठशाला : संतान को मनुष्य बनाने की प्रक्रिया की शुरुआत मां से।
परिवार की शक्ति : रिश्तों को जोड़ना, उनका पोषण करना और परिवार को दिशा देना।
चेतना का स्वरूप : स्त्री को केवल देह के रूप में देखना उसके व्यापक अस्तित्व को सीमित करना।
वास्तविक सशक्तिकरण : आर्थिक स्वतंत्रता के साथ संस्कार, चेतना और निर्णय की शक्ति को भी महत्व देना।