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कैसे शुरू हुआ बवाल? जांच आयोग की रिपोर्ट में दर्ज 190 से ज्यादा गवाहों के बयान, संभल हिंसा की परत-दर-परत पड़ताल

Sambhal Violence Report Update: संभल हिंसा जांच आयोग की रिपोर्ट में 199 गवाहों के बयान, वैज्ञानिक साक्ष्यों और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर हिंसा को सुनियोजित साजिश बताया गया है। रिपोर्ट में घटनाक्रम, कथित भूमिका निभाने वाले लोगों और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कई महत्वपूर्ण सिफारिशें भी शामिल की गई हैं।
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Aug 06, 2026
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संभल हिंसा की परत-दर-परत पड़ताल। फोटो सोर्स- पत्रिका न्यूज

Sambhal Violence Report Row: :संभल की शाही जामा मस्जिद सर्वे के दौरान 24 नवंबर 2024 को हुई हिंसा पर गठित न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट उत्तर प्रदेश विधानमंडल के दोनों सदनों में पेश कर दी गई। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला कि यह हिंसा अचानक नहीं भड़की थी, बल्कि इसके पीछे सुनियोजित साजिश थी। रिपोर्ट तैयार करने में 199 गवाहों के बयान, एएसआई के अभिलेख, बैलेस्टिक रिपोर्ट, वैज्ञानिक साक्ष्य और संभल के सांप्रदायिक इतिहास का अध्ययन शामिल किया गया।

WhatsApp संदेशों और बयानों से बढ़ा तनाव

रिपोर्ट के अनुसार, 21 नवंबर 2024 को संभल सांसद के नाम से बने एक WhatsApp ग्रुप में लोगों से शाही जामा मस्जिद में बड़ी संख्या में नमाज अदा करने की अपील की गई। इसी तरह के संदेश अन्य सोशल मीडिया समूहों में भी साझा किए गए। इसके अगले दिन सांसद के एक सार्वजनिक बयान के वायरल होने के बाद इलाके का माहौल और अधिक तनावपूर्ण हो गया। आयोग के अनुसार, इसके बाद बड़ी संख्या में लोग मस्जिद के आसपास जुटे और स्थिति तेजी से बिगड़ती चली गई।

हिंसा के दौरान पुलिस पर हमला और हथियार लूटने का दावा

रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंसा के दौरान भीड़ ने पुलिस बल पर पथराव, आगजनी और फायरिंग की। आयोग के अनुसार, इस दौरान पुलिसकर्मियों की पिस्टल और मैगजीन भी छीनी गईं और उनका इस्तेमाल फायरिंग में किया गया, जिससे कई पुलिसकर्मी घायल हुए। इस हिंसा में 4 लोगों की मौत हुई थी, जबकि कई पुलिसकर्मी और अधिकारी भी घायल हुए थे।

आयोग ने कई लोगों की भूमिका का किया उल्लेख

जांच आयोग ने अपनी रिपोर्ट में संभल के सांसद, जामा मस्जिद इंतजामिया कमेटी के अध्यक्ष, सचिव तथा एक स्थानीय विधायक प्रतिनिधि सहित कुछ अन्य व्यक्तियों की भूमिका का उल्लेख किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अदालत के आदेश की वास्तविक प्रकृति लोगों तक सही तरीके से नहीं पहुंचाई गई और मस्जिद के अस्तित्व को लेकर भ्रम फैलाया गया, जिससे तनाव बढ़ा।

19 नवंबर से ही शुरू हो गई थी साजिश की तैयारी

आयोग के मुताबिक, 19 नवंबर 2024 को हुए अधूरे सर्वे के बाद ही माहौल को तनावपूर्ण बनाने की कोशिशें शुरू हो गई थीं। लोगों के बीच यह संदेश फैलाया गया कि सर्वे के बहाने मस्जिद पर कब्जा या उसे नुकसान पहुंचाने की तैयारी हो रही है। जबकि आयोग के अनुसार, अदालत का आदेश प्राचीन स्मारक अधिनियम के तहत रखरखाव और सार्वजनिक प्रवेश से जुड़े पहलुओं तक सीमित था।

199 गवाहों और वैज्ञानिक साक्ष्यों पर आधारित है रिपोर्ट

आयोग ने बताया कि उसकी रिपोर्ट केवल मौखिक बयानों पर आधारित नहीं है। जांच के दौरान 199 गवाहों के बयान दर्ज किए गए। इसके अलावा बैलेस्टिक जांच, एएसआई के रिकॉर्ड, फोरेंसिक साक्ष्य और अन्य दस्तावेजों का भी विश्लेषण किया गया। आयोग ने संभल के लगभग 90 वर्षों के सांप्रदायिक इतिहास का भी अध्ययन किया और 1978 के दंगे का विशेष उल्लेख किया।

पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई को बताया प्रभावी

रिपोर्ट में जिला प्रशासन और पुलिस की कार्रवाई को परिस्थितियों के अनुरूप बताया गया है। आयोग का कहना है कि समय पर सुरक्षा व्यवस्था, संयमित कार्रवाई और पर्याप्त पुलिस बल की मौजूदगी के कारण हिंसा बड़े सांप्रदायिक दंगे में तब्दील नहीं हो सकी। आयोग के अनुसार, इससे हिंसा को अन्य संवेदनशील इलाकों तक फैलने से रोका जा सका।

आयोग की प्रमुख सिफारिशें

सोशल मीडिया पर सख्ती: अफवाह, फर्जी वीडियो और भड़काऊ पोस्ट साझा करने वालों के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज कर कानूनी कार्रवाई की जाए।

भड़काऊ बयानों पर कार्रवाई: धार्मिक या राजनीतिक आधार पर तनाव बढ़ाने वाले सार्वजनिक बयानों के मामलों में कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

कोर्ट सर्वे से पहले विस्तृत सुरक्षा योजना: विवादित धार्मिक स्थलों के सर्वे से पहले खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट, सुरक्षा योजना और स्थानीय प्रशासन की तैयारी अनिवार्य हो।

स्थानीय स्तर पर संवाद बढ़ाया जाए: सर्वे से पहले दोनों पक्षों के संभ्रांत नागरिकों, धर्मगुरुओं और शांति समिति के सदस्यों के साथ संवाद स्थापित किया जाए।

संवेदनशील जिलों में खुफिया तंत्र मजबूत हो: लोकल इंटेलिजेंस यूनिट (LIU) को मजबूत किया जाए और थाना स्तर पर आधुनिक दंगा-रोधी संसाधन उपलब्ध कराए जाएं।

एएसआई संरक्षित स्थलों की नियमित निगरानी: एएसआई संरक्षित स्मारकों में बिना अनुमति निर्माण या बदलाव पर तत्काल कार्रवाई हो तथा जिला प्रशासन और एएसआई संयुक्त निरीक्षण करें।

सांप्रदायिक सौहार्द के लिए नियमित बैठकें: संवेदनशील क्षेत्रों में समय-समय पर शांति समिति की बैठकें और नागरिक संवाद आयोजित किए जाएं ताकि भविष्य में तनाव की स्थिति को रोका जा सके।

कैसे शुरू हुआ बवाल

तारीखघटनाक्रम
19 नवंबर 2024हिंदू पक्ष ने अदालत में दावा किया कि शाही जामा मस्जिद का स्थल हरिहर मंदिर है और इस संबंध में वाद दायर किया।
19 नवंबर 2024चंदौसी की सिविल कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए मामले की सुनवाई शुरू की।
19 नवंबर 2024अदालत ने कोर्ट कमिश्नर नियुक्त कर शाही जामा मस्जिद के सर्वे का आदेश जारी किया।
19 नवंबर 2024 (शाम)कोर्ट कमिश्नर अपनी टीम के साथ शाम करीब 7 बजे शाही जामा मस्जिद में प्रारंभिक सर्वे के लिए पहुंचे।
22 नवंबर 2024जुमे की नमाज के दिन मस्जिद के बाहर मीडिया से बातचीत के दौरान सांसद ने सार्वजनिक बयान दिया, जिसके बाद माहौल और अधिक संवेदनशील हो गया।
24 नवंबर 2024 (सुबह)सुबह करीब 7 बजे कोर्ट कमिश्नर दोबारा सर्वे के लिए पहुंचे। इसके बाद क्षेत्र में तनाव बढ़ा और हिंसा की घटना सामने आई।

बता दें कि न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) देवेंद्र कुमार अरोड़ा की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय आयोग ने अपनी रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला है कि यह हिंसा पूर्व नियोजित साजिश का परिणाम थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि भीड़ को उकसाने, अफवाहें फैलाने और तनावपूर्ण माहौल बनाने में कुछ राजनीतिक और स्थानीय लोगों की भूमिका सामने आई है। आयोग के अनुसार, 19 नवंबर को अधूरा सर्वे होने के बाद से ही माहौल को तनावपूर्ण बनाने की कोशिशें शुरू हो गई थीं। रिपोर्ट में कहा गया है कि लोगों के बीच यह संदेश फैलाया गया कि सर्वे के बहाने मस्जिद पर कब्जा करने या उसे नुकसान पहुंचाने की योजना है। जबकि अदालत के आदेश में केवल प्राचीन स्मारक अधिनियम के तहत रखरखाव और आम लोगों के प्रवेश से जुड़े पहलुओं पर विचार करने की बात कही गई थी।

रिपोर्ट में कई लोगों की भूमिका का उल्लेख

जांच आयोग ने अपनी रिपोर्ट में संभल के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क, विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल तथा जामा मस्जिद इंतजामिया कमेटी के कुछ पदाधिकारियों की भूमिका का उल्लेख किया है। आयोग का कहना है कि इन लोगों की भूमिका की जांच के दौरान उपलब्ध साक्ष्यों और बयानों के आधार पर रिपोर्ट तैयार की गई है।