पांच एकड़ के काश्तकार तुर्की गांव निवासी रामकरण सिंह ने अपनी पूरी आराजी में बड़े उम्मीद के साथ सोयाबीन की बोवनी की थी। चार माह फसल की सपरिवार बच्चों की तरह सेवा करने के बाद जब फसल काटी तो उपज देखकर उनके पैर के नीचे की जमीन खिसक गई।
सोयाबीन की लहलहाती फसल को देखकर उन्होंने जो सपने देखे थे वे एक-एक कर उनकी आंखों के समाने नाचने लगे। अपनी उपज लेकर मंडी आए रामकरण ने बताया कि पांच एकड़ जमीन की उपज से पांच बोरियां नहीं भरीं। कुल चार बोरी सोयाबीन हुआ है। हलांकि मंडी में उनका सोयाबीन सबसे महंगा बिका। रामकरण ने बताया कि जब घर में फसल ही नहीं तो दाम अच्छे मिलने या न मिलने से कोई फर्क नहीं पड़ता। 30 लाख की लगत से पांच एकड़ में फसल लगाई थी। लेकिन, उपज मात्र 9 हजार की हुई है। एसी खेती से हम किसानों के दिन कैसे बदल सकते हैं। चबूतरे पर बिखरी फसल समेटे हुए किसान ने कहा कि अब खेती के बूते परिवार चलाना मुश्किल हो गया है। सूखे की मार ने अरमानों पर पानी फेर दिया। छह माह हाड़ तोड़ मेहनत की, लेकिन जितनी उपज मिली उससे मेहनताना निकालना मुश्किल है। अब यह समझ में नहीं आ रहा कि इस पैसे से खाद-बीज खरीदी या बिजली का बिल कैसे भरें।
जिसने कभी खेती नहीं की, वह क्या जाने सूखे का दर्द
रामकरण की बात गंभीरता से सुन रहे दूसरे किसानों ने बीच में टोकते हुए कहा कि सोयाबीन ने जिले के किसानों को बार्बद कर दिया। सरकार से राहत की उम्मीद थी, लेकिन सूखे के नाम पर नेता राजनीति कर रहे हैं। पड़ोस का जिला सूखाग्रस्त घोषित हो गया। सतना के किसानों की पीड़ा यहां के नेताओं को दिखाई नहीं देती। इतना सुनते ही निराश रामकरण ने कहा कि जिसने कभी खेत नहीं देखा, बोवनी नहीं की? वह क्या जाने सूखे का दर्द क्या होता है।