
भारत भूषण श्रीवास्तव@सतना। जिले में सत्ताधारी भाजपा, मुख्य विपक्षी कांग्रेस सहित बसपा व सपा के हाथ महिलाओं को टिकट देने में तंग रहे। सन 1951 से 2013 तक सतना ने 14 विधानसभा चुनाव देखे हैं। 70 साल के दौरान मात्र 8 महिलाओं को टिकट दिए गए, जबकि 35 से ज्यादा पुरुषों पर पार्टियों ने भरोसा जताया। जिले से 2 महिलाएं विधानसभा तक पहुंचीं। सतना विधानसभा से कांताबेन पारेख दो बार तो रैगांव विधानसभा से ऊषा चौधरी 2013 में विधायक चुनी गईं। अन्य पांच सीट अमरपाटन, नागौद, मैहर, रामपुर बाघेलान व चित्रकूट से एक भी महिला विधायक नहीं बन सकी।
अमरपाटन में एक भी महिला को टिकट नहीं
जिले की अमरपाटन विधानसभा सीट ऐसी है, जहां आज तक किसी भी महिला को कांग्रेस, भाजपा, बसपा व सपा ने टिकट नहीं दिया। सतना से 2, रैगांव 3, चित्रकूट से 1, नागौद से 1, मैहर से 1, रामपुर से 2 बार महिलाओं को टिकट मिला।
दो दशक की राजनीतिक उपेक्षा
सतना में करीब दो दशक तक टिकट के मामले में नारी शक्ति उपेक्षित रही। 1977, 1980, 1985, 1990, 1993 व 1998 में महिलाओं को पार्टियों ने दावेदार के रूप में नहीं शामिल किया।
कांताबेन ने बदले समीकरण
सतना की पहली महिला विधायक का श्रेय कांताबेन पारेख को जाता है। कांग्रेस ने उन्हें 1967 में टिकट देते हुए मैदान में उतारा था। भारतीय जनशक्ति के सुखेंद्र सिंह सहित 7 प्रत्याशी मैदान में थे। इसमें 6 पुरुष थे। लेकिन, चुनावी गणित साधने में कांताबेन पारेख कामयाब रहीं। वे 46.11 फीसदी वोट के साथ विधायक चुनी गईं। 1972 में भी सुखेंद्र सिंह सहित 7 पुरुषों के हराया था। उन्हें 56.26 फीसदी वोट मिले थे।
2003 रहा सुनहरा
2003 का विधानसभा चुनाव महिलाओं के लिए सुनहरा रहा। प्रदेश में भाजपा से उमा भारती मुख्यमंत्री प्रत्याशी थीं। लिहाजा, पार्टियों ने महिलाओं को संदेश देने के लिए बड़ी संख्या में टिकट दिया। इसका असर भी देखने को मिला। सात विधानसभा में 5 पर महिलाओं को पार्टियों ने टिकट दिया। भाजपा, कांग्रेस, बसपा व गोंगपा से 6 महिलाएं दावेदार के रूप में मैदान में थीं। चित्रकूट से गोंगपा ने ऊषा सिंह, बसपा ने रैगांव से ऊषा चौधरी व नागौद से सावित्री कुशवाहा को टिकट दिया। मैहर में कांग्रेस ने प्रतिभा पटेल व भाजपा ने यशोदा मिश्रा को प्रत्याशी बनाया। रामपुर में कांग्रेस ने संगीता सिंह को उम्मीदवार बनाया। हालांकि इनमें से कोई विधायक नहीं चुना गया।
एक्सपर्ट कमेंट
सतना की यह कड़वी सच्चाई है, हर पार्टी की भूमिका नकारात्मक रही। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण था कि हर पार्टी जीत के समीकरण पर जोर देती रही। जब महिलाओं को मौका मिला भी, तो ज्यादातर को हार का सामना करना पड़ा। इसके लिए भी पार्टियां जिम्मेदार हैं। कमजोर सीट पर महिला को टिकट दिया गया और संदेश पूरे विंध्य में दिया गया कि महिलाओं को हमने टिकट दिया है।
अशोक शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार, सतना
पार्टी स्तर पर जब भी बात आती है तो महिलाओं को टिकट देने का प्रस्ताव रखा जाता है। टिकट वितरण हर समीकरण को देखकर होता है। लिहाजा, केवल आधी-आबादी को आधार नहीं बनाया जा सकता। इस बार भी ज्यादा से ज्यादा महिला को टिकट देने की मांग की गई है।
किरण सेन, जिलाध्यक्ष, भाजपा महिला मोर्चा, सतना
कांग्रेस संगठन ने तय किया है कि हर लोकसभा क्षेत्र की विस सीट पर एक महिला को टिकट दिया जाए। यह प्रयास चल भी रहा है। हम अभी नहीं कह सकते कि सतना में वो कौन महिला है, लेकिन पार्टी स्तर पर प्रयास हो रहा है।
उर्मिला त्रिपाठी, प्रदेश उपाध्यक्ष, महिला कांग्रेस, सतना