09 अगस्त 2017 को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद कर चुके है सम्मान
सतना। देशभर में जहां 26 जनवरी 2018 के उपलक्ष्य में देशभक्त सपूतों और आजादी के नायकों की बातें याद की जा रही है। वहीं आज भी कई ऐसे रहस्य है जिनको बहुत कम लोग जानते है। हम बात कर रहे है मध्यप्रदेश के सतना जिला की। जिसने देश को आजाद कराने में अपनी भूमिका तो अता की ही साथ ही कई वीर जवानों का बलिदान भी दिया था।
गोवा को पुर्तगालियों से मुक्त कराने के लिए जो आंदोलन भारतवासियों द्वारा चलाया गया था। उसमें सतना से भी चार लोग शामिल हुए थे। इनमें से अभी जीवित दो स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने पत्रिका को गोवा आंदोलन से संबंधित जानकारी देते हुए भावुक हो गए। बोले वो दिन शहीदों के बलिदान का दिन था। हमने साथियों को तो खो दिया लेकिन पुर्तगालियों के जबड़े से आजादी झीन ली।
कोविंद कर चुके है सम्मान
बीते वर्ष स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद 9 अगस्त 2017 को राष्ट्रपति भवन में बुलाकर विधिवत दोनों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का सम्मान कर चुके है । प्रदेश से सिर्फ चार सेनानियों को राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया जाना है। इनमें भैया बहादुर सिंह पिता रघुनंदन सिंह निवासी ब्रह्मीपुर और राजबहादुर सिंह पिता सुदर्शन सिंह निवासी पडऱी जिले से शामिल हैं। दोनों सेनानियों का हाल निवास सतना पौराणिक टोला है।
फिर पुर्तगालियों से मुक्त हुआ था गोवा
बहादुर सिंह ने बताया, स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के दौरान अंग्रेजों की फौज से बगावत करने वाले सीताराम नेपाली उनके गांव में रहने लगे थे। कुछ साल बाद उन्होंने बताया, गोवा को विदेशियों से मुक्त कराने गोवा मुक्ति आंदोलन शुरू हो रहा है। जो भी चलना चाहता है सतना पहुंचे। इस पर वे और उनके पड़ोस के गांव पडऱी के राजबहादुर सिंह सहित चार लोग आंदोलन में शामिल होने के लिए पहुंचे। रेलवे स्टेशन पर जमुना प्रसाद शास्त्री और चंद्र प्रताप तिवारी जी से भेंट हुई। इनके नेतृत्व में और भी कई लोग जा रहे थे। यहां से सभी पूना पहुंचे। वहां से रत्नागिरी और फिर गोवा की सीमा के स्टेशन सरसोली पहुंचे।
पानी में मिला दिया गया था जहर
वहां विदेशियों की फौज थी। शुरुआत में फौज ने आगे जाने दिया और एक दूरी बनाकर वे पीछे चलने लगे। सरसोली में देशभर से पहुंचे आंदोलनकारियों ने एक मंदिर में पड़ाव डाला। यहां भजन-कीर्तन का आयोजन चला। इसके बाद आगे चले। नाला पार कर जैसे ही गोवा की सीमा में दाखिल हुए तो एक गांव मिला जो वीरान था। वहां एक बुढिय़ा मिली। जब लोगों ने यहां पानी पीने की तैयारी की तो उसने इशारा किया कि यहां के पानी में जहर मिलाया गया है।
कई हुए थे शहीद
जैसे ही आंदोलनकारी आगे बढ़े तो पीछे से पहुंची फौज ने गोली चलाना शुरू कर दी। इसमें कई लोग शहीद हो गए। भैया बहादुर सिंह ने बताया कि वे और उनके अन्य साथी तुरंत लेट गए थे। इसलिए बच गई। उनके एक साथी विक्रम सिंह जो टीकमगढ़ निमाड़ी के निवासी थे उन्हें भी गोली लगी थी और वे घायल थे। फौज ने सबको बंदी बना लिया। इस दौरान आंदोलनकारियों ने मांग करनी शुरू कर दी कि हमें पंजिम ले जाया जाए। इससे फौज सहमत नहीं थी।
मुंबई होते हुए आए थे सतना
आखिर में जमुना प्रसाद शास्त्री, राममिलन तिवारी और अन्य नेतृत्वकतार्ओं ने कोंकणी भाषा जानने वालों को फौज बंदी बना कर जेल ले गई और सभी को वापस जाने के लिए छोड़ दिया। इसके बाद सभी लोग निकटतम स्टेशन डगडोला पहुंचे। जहां विक्रम सिंह और अन्य घायलों का इलाज कराया गया। इसके बाद पूना से बंबई (मुंबई) होते हुए वापस सतना आए।
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