
सवाईमाधोपुर. यूं तो हमारा जिला आज रणथम्भौर दुर्ग और रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान के कारण विश्व भर में अपनी एक अलग पहचान रखता है लेकिन बहुत कम लोग यह जानते है कि पुराने समय में जिले में चमड़ा, बर्तन, लकड़ी, खस, गलीचा आदि कई छोटे-छोटे उद्योग संचालित थे। इन उद्योगों ने भी पूर्व में जिले को एक खास पहचान दिलाई थी लेकिन कालांतर में ये सब उद्योग आधुनिकता की भेंट चढ़ गए। बुधवार को जिले का 259 वां स्थापना दिवस है ऐसे में पत्रिका ने जिले के पुराने उद्योगों के बारे में जानकारी जुटाई है, जिन्हे यदि फिर से जिवित किया जाए तो जिले की सूरत बदल सकती है। पेश है एक रिपोर्ट..
कभी दुनिया भर में महकती थी जिले के इत्र की खुश्बू
जिले में रियासतकालीन समय में इत्र का कारोबार बड़े पैमाने पर किया जाता था। यहां गुलाब और खस से इत्र तैयार किया जाता था। जिले के इत्र की विदेशों तक मांग थी। जानकारों की माने तो जिले से गुलाब के फूलों व खस घास से तैयार किया गया इत्र दिल्ली, मुंबई आदि बड़े शहरों में भेजा जाता था। इन बड़े शहरों से इत्र को विदेशोंं तक सप्लाई किया जाता था। पूर्व में जिले के किसान खस घास की खेती बहुतायत से करते थे लेकिन धीरे-धीरे आधुनिक मशीनों से इत्र तैयार किया जाने लगा, ऐसे में हस्त निर्मित इत्र बनाने में लागत अधिक आने और मुनाफा कम होने के कारण लोगों को इससे रुझान कम हो गया।
कागज व छपाई उद्योग ने तोड़ा दम
जिले में पहले कागज बनाने का काम भी बहुतायत से किया जाता था। इतिहासकार प्रभाशंकर उपाध्याय ने बताया कि पुराने शहर के लोग इस काम में जुड़े हुए थे। कागज बनाने का काम करने के कारण ही शहर में एक मोहल्ले का नाम कागजी मोहल्ला पड़ा। इसके लिए पेड़ों की छाल का उपयोग किया जाता था। बाद में जिले में रणथम्भौर राष्टीय उद्यान की स्थापना होने और पेड़ों की कटाई पर वन विभाग व सरकार की ओर से प्रतिबंध लगाने के बाद इस उद्योग ने भी धीरे-धीरे दमतोड दिया। इसके अलावा पहले शहर में छपाई का काम भी किया जाता था। इस काम से जुड़े लोगों को छीपा कहा जाता था लेकिन बाद में मशीनों का चलन बढऩे के साथ ही यह उद्योग भी खत्म होने के कगार पर है।
कभी गूंजती थी टकसाल की ठकठक
पूर्व में जिले में बर्तन उद्योग भी अपने चरम पर था। पुराने शहर में इस काम से करीब एक हजार से अधिक लोग जुड़े हुए थे। जो लोग बर्तन बनाने के काम से जुड़े थे उन्हें ठठेरा के नामसे जाना जाता था। शहर में ऐसे लोगों के रहने की जगह को ठेठेरा मोहल्ल कहा जाता था लेकिन बाद में यह उद्योग में बंद हो गया और टकसाल खत्म हो गई। हालांकि शहर मेें ठेठेरा मोहल्ला आज भी है।
चमड़ा उद्योग की चमक हुई फीकी
पहले के समय में पुराने शहर में चमड़ा उद्योग का भी चलन था। शहर में जुलाहा जाति के लोग चपड़े के कारोबार से जुड़े हुए थे। ये लोग जूते के अलाव चमड़े से बनने वाले अन्य सामग्री व उत्पाद भी बनाते थे। हालांकि बाद में मेहनत अधिक होने और मुनाफा कम होने के कारण इस उद्योग ने भी दम तोड दिया। हालांकि पुराने शहर में जुलाहा मोहल्ला आज भी है लेकिन यहां रहने वाले अधिकांश लोग यह काम अब छोड़ चुके हैं।
अब नहीं बनते लकड़ी के खिलौने
पूर्व में शहर खाती समाज से जुड़े लोग लकड़ी के खिलौने व अन्य उत्पाद बनाते थे। गुडला, डमरू , बैट आदि कई खिलौने बनाए जाते थे लेकिन यह उद्योग भी लगभग खत्म हो गया है। हालांकि आज भी चंद लोग शहर में लकड़ी के खिलौने बनाने का काम कर रहे हैं लेकिन अब धीरे-धीरे यह उद्योग भी दम तोड़ता जा रहा है।
इनका कहना है....
जिले में रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान के कारण कोई बड़ा उद्योग स्थापित करना आसान नहीं है। लेकिन जिले के पुराने छोटे उद्योगों को यदि फिर से बढ़ावा दिया जाए तो लोगों को रोजगार मिलेगा और जिले की अर्थव्यवस्था भी सुदृढ होगी। इसके लिए राज्य सरकार के एमएसएमई एक्ट में भी विशेष प्रावधान किए गए हैं।
- परिक्षित हाड़ा, व्याख्याता अर्थशास्त्र।
सवाईमाधोपुर जिले की अर्थव्यवस्था में पहले यहां के लघु उद्योगों का खासा योगदान रहा था। हालांकि अब ये अधिकतर उद्योग बंद हो गए है और जिले की अर्थव्यवस्था कृषि और पर्यटन पर आधारित हो गई है। हालांकि यदि इन उद्योगों को फिर से जिवित किया जाए तो इससे जिले की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है।
- प्रियंका, व्याख्याता अर्थशास्त्र।