Temples in India सच्चे मन से आशीर्वाद मांगने वाला कभी निराश नहीं हुआ मां के दरबार से 1100 सीढ़ियां चढ़कर आना होगा, रोप-वे को अभी बंद रखा गया है मंदिर में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कड़ाई से कराया जाएगा
सीहोर। सुप्रसिद्ध सलकनपुर देवी मंदिर (Salkanpur Maa Vijayasan Mandir) लाॅकडाउन के बाद अब सबके दर्शन के लिए खोला जा रहा है लेकिन मां के दर्शन के लिए पैदल ही जाना पड़ेगा। रोप-वे को फिलहाल बंद रखा गया है। विंध्याचल (Vindhyanchal) की पहाड़ियों में स्थित माता के मंदिर की कीर्ति आदि काल से है। मान्यता है कि श्रद्धा व विश्वास के साथ जो भी महिला संतान प्राप्ति की कामना लेकर आती है मां उस की गोद सूनी नहीं रखती। यही नहीं कन्याएं मनचाहा वर की चाहत में मां से आशीर्वाद लेने आती।
सीहोर जिले में विंध्यचाचल पर्वत श्रृंखलाओं की गोद में मां विजयासन धाम (Maa Vijayasan dham) है। विंध्यवासिनी बीजासन देवी का यह सिद्धपीठ रेहटी तहसील (Rehati tehsil of Sehore)मुख्यालय के समीप सलकनपुर गांव में है। मंदिर करीब 800 फीट उंची पहाड़ियों पर स्थित है। भोपाल से करीब 70 किलोमीटर दूर इस मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब 1100 सीढ़ियां हैं। मंदिर तक पहुंचने के लिए 1100 सीढ़ियों को चढ़कर जाना होता है तब जाकर मां का दर्शन होता है। इसके अलावा रोप-वे से भी मंदिर तक पहुंचा जा सकता है।
नई व्यवस्था के तहत दर्शन के लिए यह किया गया बदलाव
सलकनपुर मां विजयासन धाम ट्रस्ट के प्रशासक एसडीएम केके रावत ने बताया कि मंदिर को सैनिटाइज किया जा रहा है। सोशल डिस्टेंस का पालन कराने के लिए मंदिर परिसर में गोल घेरे बनाए जाएंगे। मंदिर परिसर में आने वाले श्रद्धालुओं को मास्क पहनना अनिवार्य होगा। पहले रोपवे से भी श्रद्धालू मंदिर में पूजन-दर्शन को आते थे लेकिन अगले आदेश तक रोप-वे सुविधा बंद रखी गई है। दर्शन करने आने के लिए 1100 सीढ़ियों को चढ़कर ही आना होगा।
हर साल लगता है मेला, 500 साल के इतिहास में पहली बार नहीं लगा
मां विजयासन धाम (Maa Vijayasan dham)में हर साल मेला लगता है। नवरात्रि पर लगने वाले इस मेला में हजारों लोग आते हैं। करीब पांच सौ साल से यह मेला लगता है लेकिन कोरोना संक्रमण को देखते हुए मंदिर ट्रस्ट ने मेला नहीं लगवाया।
मां पार्वती की अवतार मानी जाती हैं सलकनपुर की मां विजयासन देवी
सलकनपुर देवी मंदिर में मां विजयासन के बारे में मान्यता है कि वह माता पार्वती की अवतार हैं जिन्होंने देवताओं के आग्रह पर रक्तबीज राक्षक का वध किया था। विजयासन मां को लोग कुलदेवी के रुप में भी पूजते हैं। माता कन्याओं को मनचाहा जीवनसाथी का आशीर्वाद देती हैं। माता यहां अपने भक्तों की सूनी गोद भी भरती हैं। मंदिर में मां विजयासन देवी की प्रतिमा स्वयं-भू है। यह प्रतिमा माता पार्वती की है, जो वात्सल्य भाव से अपनी गोद में भगवान गणेश को लेकर बैठी हुई है। इस भव्य मंदिर में महालक्ष्मी, महासरस्वती और भगवान भैरव की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं।
विजयासन धाम में ही किया था मां ने रक्तबीज का वध
रक्तबीज ने छल से वरदान प्राप्त कर लिया था कि रक्तबीज के शरीर का जितना बूंद भी रक्त धरती पर गिरेगा उससे एक नया रक्तबीज जन्म लेगा जो बल, शरीर व रुप से रक्तबीज के समान ही होगा। रक्तबीज को जब भी किसी ने अस्त्र-शस्त्र से मारने की कोशिश की तो उसका रक्त जमीन पर गिरते ही हजारों की संख्या में रक्तबीज पैदा हो जाते। ये राक्षक तीनों लोगों में उत्पात मचाने लगे। मान्यता के अनुसार रक्तबीज दैत्यों के राजा शुम्भ व निशुम्भ का सेनानायक था।
देवताओं ने जब त्रिदेवों से रक्तबीज के वध की मांग कि तो त्रिदेव ने अपने अपने तेज से तीन देवियों को प्रकट किया। तीनों देवियों ने रक्तबीज का वध मां काली की मदद से की। रक्तबीज के रक्त का एक भी बूंद मां काली ने जमीन पर गिरने ही नहीं दिया। मां चंड़िका के क्रोध से अवतरित मां काली ने रक्तबीज का गर्दन काटकर अपने खप्पर में रख लिया और उसके रक्त का पान करती गई। इस तरह रक्तबीज का आदिशक्ति ने अंत किया।