सिवनी

दैवीय और आसुरी सम्पदा का किया वर्णन

पिपरिया कला में हो रहा कथा का आयोजन

2 min read
Mar 09, 2018

सिवनी. दैवी सम्पदा मुक्ति के लिए और आसुरी सम्पदा बंधन का कारण है। श्रीमद्भागवत गीता के सोलहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि भय का सर्वथा अभाव, अन्त: करण की पूर्ण निर्मलता, तत्वज्ञान के लिए ध्यानयोग में निरन्तर दृढ स्थिति दैवी सम्पदा है। देैवी और आसुरी सम्पदा के संबंध में उक्त उदगार प्रज्ञानानंद महाराज द्वारा श्रीमद्भागवत कथा महोत्सव के अवसर पर कहे गए।
खैरापलारी क्षेत्र के पिपरिया कला में आयोजित कथा के अवसर पर शुक्रवार को महाराज ने दैवी सम्पदा के संबंध मे बताते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा 16 वं अध्याय के पहले, दूसरे और तीसरे श्लोक मे 26 गुणों का वर्णन किया गया है जो दैवी सम्पदा कहा जाता है।
पहला अभय दूसरा सत्वसंशुद्धि और तीसरा ज्ञानयोग व्यवस्थिति इनका विस्तार पूर्वक वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि सोलहवें अध्याय में दैव एव असुर सम्पदाओं का बडा ही स्पष्ट और सुन्दर वर्णन है। गीता के सोलहवें अध्याय में व्यवहारिक, नैतिक एवं अध्यात्म प्रधान विचारों को दैवी सम्पदा ओर उनके विपरीत विचारों को आसुरी सम्पदा के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
महाराज ने उपस्थितजनों से कहा कि सर्वप्रथम दैवी सम्पदा का वर्णन इस अध्याय के प्रथम तीन श्लोकों में किया गया है ओर बाद में विस्तार से आसुरी सम्पदा का वर्णन विशेष है। दैवी सम्पदा के लक्षण है भय का सर्वथा अभाव अर्थात अभय। उन्होंने भय के दो प्रकार बताते हुए कहा कि पहला भय बाहर का एवं दूसरा भय भीतर का, चोर, डाकू सर्प आदि का भय बाहरी भय है, जबकि मानव जब पाप, अन्याय, अत्याचार करता है तब उसे भीतर का भय होता है। जब ईश्वर से संबंध जुड़ जाता है तब यह भय समाप्त हो जाता है।
महाराज ने कहा कि अनिष्ट की आशंका से मनुष्य के भीतर जो घबराहट होती है, उसका नाम भय है और उस भय के सर्वथा अभाव का नाम अभय है। यहां दैवी संपत्ति में सबसे पहले अभयम पद देने का तात्पर्य यह है कि जो भगवान के शरण होकर सर्वभाव से भगवान का भजन करता है, वह सर्वत्र अभय हो जाता है।
सत्वशुद्धि: का विवेचन के अंतर्गत महाराज ने आहार शुद्धि के संबंध में कहा कि आहार की शुद्धि से अंत:करण शुद्ध होने पर ही परमात्व तत्व को जानने की जिज्ञासा होती है। शरीर और मन की सात्विकता के लिए आहार-शुद्धि अनिवार्य है। आहार शुद्धौ सत्वशुद्धि की बात करते हुये उन्होने कहा कि श्रीमद्भगव गीता में भी युक्ताहार और विहार की बात कही गई है। मनुष्य जीवन के लिए शाकाहार ही सर्वश्रेष्ठ है। लेकिन आज हमारा आहार बिगड़ गया है। जूठ-अनूठ, भक्ष्याभक्ष्य का ध्यान रखे बिना कुछ भी जानवरों की तरह खाए जा रहे हैं।
जल के सम्बंध मे भी उन्होंने बताया कि आज नदियों का जल प्रदूषित हो चुका है। गीता खान-पान पर विशेष ध्यान रखने के लिए कहती है। आज नदियों पर मनमाने ढंग से बंाध बनाए जाकर नदियों के प्रवाह को रोका जा रहा है, जिससे नदियों का जल प्रदूषित हो गया। जबकि नदियां विश्वरूप परमात्मा की नाडिय़ां हैं। छोटे-छोटे प्रसंगों उदाहरणों के माध्यम से बड़े सहज सरल तरीके से जीवन के गूढ रहस्यों को समझाया। ज्ञान और योग निष्ठा पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि जीव और ईश्वर की एकता का सम्यक बोध ज्ञान होता है।

Published on:
09 Mar 2018 12:15 pm
Also Read
View All