MP News: गांवों में आज भी होली का डांडा नहीं गाड़ा जाता। कई गांवों में तो होली ही नहीं जलाई जाती है। वर्षों पुरानी यह परंपरा जिले के कई गांवों में आज भी निभाई जा रही है।
Holika Dahan: श्योपुर जिले के आधा दर्जन गांव में परंपरा अनुसार आज भी होली का डांडा नहीं गाड़ा जाता है। गांव में अपने वर्चस्व के लिए सालों पहले ग्रामीण एक-दूसरे गांव से होली के डांडे को चुरा ले जाते थे। होलिका पर्व के दौरान जिस गांव के ग्रामीण अपने डांडे को बचा नहीं पाते थे उन गांव की होली को सूनी मान लिया जाता था।हो वहां लिका दहन नहीं किया जाता था।
खास बात यह है कि, जब तक ग्रामीण अपने गांव के डांडे को संबंधित गांव से इसी प्रकार वापस नहीं ले आते थे तब तक उनकी होली सूनी ही रहती थी। आज भी यह परंपरा चली आ रही है। जिले के बगहुआ, दूनी सीसवाली, दलारना, तिल्लीपुर ऐसे गांव है जो आज तक अपनी होली के डांडे का वापस नहीं ला पाएं है। यही वजह है कि, 73 सालों से आज भी इन गांवों में होली का डांडा नहीं लगाया जाता। (MP News)
सालों पहले ग्रामीण अपने गांव के दबदबे को कायम रखने के लिए होली का डांडा रखने के बाद क्षेत्र भर में ऐलान करवा देते थे कि, वह संबंधित गांव का डांडा तय दिन को उखाड़कर ले जाएंगे। इसके बाद उस गांव के सभी पुरुष तय समय में ढोल, नगाड़ों के साथ किसी गांव में जाते और डांडा उखाडकर अपने गांव में ले आते थे। इस दौरान संबंधित गांव के लोग यदि विरोध करते तो उन्हें उक्त लोगों से डांडे की छीना-झपटी या लड़ाई तक कर डांडा छीनने की जहमत उठानी पड़ती थी।
बताया गया है कि, वर्चस्व के इस खेल में कुछ लोग बुरी तरह से जख्मी भी हो गए थे। इसी वजह है अधिकांश लोग सामने वाले गांव के लोगों से जूझते नहीं थे, लेकिन होलिका दहन से पहले उनका दर्द जरूर छलक उठता है। इसमें चरों गांव भी शामिल है. जहां से 73 साल पहले पड़ोस के बगडुआ गांव के ग्रामीण डांडे को उखाड़ ले गए थे।
वर्चस्व की लड़ाई के लिए पहले पड़ोस के ग्रामीण एलान करके एक-दूसरे के गांव से होली के डांड को उखाड़कर ले जाया करते थे। वे जिन गांवों से डांडे उखाड़कर ले जाते थे। उन गांवों में आज भी होली का डांडा नहीं गाड़ा जाता। कई गांवों में तो होली ही नहीं जलाई जाती है। वर्षों पुरानी यह परंपरा जिले के कई गांवों में आज भी निभाई जा रही है।- भीमसिंह जाट, ग्रामीण
बगडुआ गांव के ग्रामीण हमारे गांव के होली के डांडे को वर्षों पहले उखाड़कर ले गए थे। तब से हमारे गांव में होलिका दहन नहीं होता। जबकि, आस-पड़ोस के गांवों में होलिका दहन बड़े धूम-धाम से किया जाता है।- दिलखुश मीणा, ग्रामीण (MP News)