
पांच हजार वर्ष पहले मानव कैसे रहते थे? उनके पास किस प्रकार के हथियार थे? वे किस देवी/देवता को मानते थे? भोजन कैसे बनाते थे? उनकी पोशाक व गहने कैसे थे? उनको क्या पसंद था? अगर आप भी यह सब जानना चाहते हैं तो सीधे सीकर में बड़ा तालाब के पास स्थित राजकीय संग्रहालय में चले आइए। पुरा महत्व का खजाना कहा जाना वाला राजकुमार हरदयाल संग्रहालय गुरुवार से आमजन के लिए खोल दिया गया है। यहां गजेन्द्र मोक्ष, भीम द्वार हाथी का वध, आजादी से पहले की बंदूक व प्राचीन प्रतिमाएं नए लुक में नजर आने लगी है। इसके अलावा नीमकाथाना से प्राप्त प्राचीन 16 तलवार, लीवर वाली छह बंदूक, पिस्टल भी गैलरी में सजाई गई हैं। पहले से मौजूद गणेश्वर से प्राप्त मृदभांड, प्रतिमाएं, ताम्र के बाणाग्र, मछली पकडऩे के कांटे, चूडिय़ां मनके, चकरी, कुल्हाड़ी आदि अंतरराष्ट्रीय स्तर के मानकों के अनुरूप सजाई गई हैं। यह सामग्री करीब तीन से पांच हजार वर्ष पुरानी मानी जा रही है। संग्रहाध्यक्ष, धर्मजीत कौर का कहना है कि संरक्षण, जीर्णोद्धार व विकास करवाने के बाद संग्रहालय को बीस जून को आमजन के लिए खोल दिया गया है। यहां गणेश्वर की पांच हजार वर्ष पुरानी पुरा सामग्री का प्रदर्शन किया गया है। इसके अलावा भी अन्य पुरा वस्तुओं का प्रदर्शन किया गया है।
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पिलानी की तर्ज पर विकास
पिलानी कस्बे में स्थित आदित्य बिडला म्यूजियम की तर्ज पर यहां भी एक आधुनिक तकनीक का कियोस्क बना दिया गया है। इस कियोस्क से भी संबंधित एतिहासिक स्थल की पूरी जानकारी दर्शक को मिल जाएगी। इसके अलावा झुंझुनूं के पुरास्थल सुनारी से प्राप्त प्रस्तर व मुणमय मनके, खेलने की मोहरें, अस्थि उपकरण, खिलौना गाड़ी के पहिये, बौद्ध मांगलिक चिन्ह युक्त फलक, चूडिय़ां, आदि को भी नए सिरे से लगा दिया गया है।