जंगे आजादी में यूं तो सभी जाति- धर्म के लोगों ने भागीदारी निभाई थी, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके इतिहास के पन्नों पर तो नाम छपे हैं, लेकिन आम- अवाम उनको भुला चुका है।
-मोहम्मद रफीक चौधरी
सीकर. जंगे आजादी में यूं तो सभी जाति- धर्म के लोगों ने भागीदारी निभाई थी, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके इतिहास के पन्नों पर तो नाम छपे हैं, लेकिन आम- अवाम उनको भुला चुका है। हम बात कर रहे हैं शेखावाटी अंचल के मुस्लिम नेताओं की जिन्होंने जंगे आजादी में बढ़- चढ कर भागीदारी निभाई और ेदेश के लिए कुरबानी भी दी। सीकर वह सरजमी है जहां हिंदू और मुसलमान में कभी भेद नहीं रहा। यहां हिंदू- और मुसलमान दोनों ने मिलकर आजादी की जंग लड़ी थी। इतिहासकार महावीर पुरोहित बताते हैं कि सीकर में हिंदू- और मुसलमान दोनों ने सदैव एक दूसरे के साथ तालमेल बनाते हुए देश की आजादी के साथ एकता और अखंडता के लिए काम किया है। पेश है सीकर के कुछ ऐसे नेताओं का कारनामा और उनके योगदान की संक्षिप्त बानगी।
वारिस खां जमींदार
सीकर नगर परिषद के सभापति रहे वारिस खां जमींदार स्वतंत्रता सेनानी और जननेता थे। 1938 में बनी सक्सन कमेटी में सेकेट्ररी युवा बद्रीनारायण सोढाणी के मुख्य कार्यकर्ता वारिस खान जमीदार व राधाकिशन ढाणी वाले थे। इस दौरान प्रतिदिन गोपीनाथ जी के मंदिर के सामने सभा जुटती थी। इस दौरान टोंक रिसायत ने सोढाणी के साथ वारिस खां व राधाकिशन को भी गिरफ्तार कर और मध्य प्रदेश के सिरोंज के गढ़ में बंद कर दिया गया। बाद मे टौंक नवाब के दौरे के बाद उनको रिहा कर दिया गया था। आजादी के बाद वारिस खान नगर पालिका के पार्षद चुने गए और बाद में सभापति भी रहे। उनकी सादगी और ईमानदारी का नमूना था कि वे सभापति बनने के बाद भी अपनी लकड़ी की दुकान पर बैठते और खुद लकड़ी फाड़कर बेचते थे।
कलंदर खां गौड़
स्वतंत्रता सेनानी कलदंर खां गौड़ कौमी एकता व सदभाव की मिसाल थे। बास्केटबाल व फुटबाल के अच्छे खिलाड़ी रहे कलदंर खां ने आजादी की जंग में बढ़ चढ़कर भाग लिया था। वे लोगों से मिलते समय जय गोपीनाथ जी से अभिवादन करते थे। विभाजन के दौरान उनके भाई पाकिस्तान चले गए, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए जाने से इनकार कर दिया वे सीकर में जन्में है, यहीं दफन होंगे। आजादी के बाद स्वतंत्रता सेनानी लादूराम जोशी ने पेंशन के लिए उनके नाम की अभिषंशा की थी लेकिन उन्होंने सरकार से पेंशन लेने इनकार कर दिया और अंतिम समय तक जनसेवा में जुटे रहे।
प्रो. मोहम्मद बख्श जहीन
-श्री कल्याण कॉलेज के प्रोफेसर रहे मोहम्मद बख्श जहीन स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ आला दर्जे के शायर थे। उनके वालिद पीरू खां खोखर भी कौमी एकता व सदभाव की मिसाल थे तथा प्रो. जहीन को उनके गुण विरासत में मिले थे। आजादी के बाद जश्न के दौरान लिखी गई उनकी नज्म - बापू ने जब आजाद हिंदोस्तान कर दिया.. बच्चे- बच्चे की जुबान पर थी। कौमी एकता व सादगी की मिसाल प्रो. जहीन आजीवन बड़ा तालाब पर ही स्नान करते रहे। ------------
अब्दुल्ला आजाद
शेखावाटी के कई लोगों ने अपनी कलम से लोगों को जगाने का काम करके देश की आजादी में योगदान दिया, उनमें से एक थे शायर अब्दुल्ला आजाद। शरीर से दुबले-पतले आजाद देश भर में पहचान रखते थे। वे जब अपना देशभक्ति से ओतप्रोत कलाम पढ़ते तो लोगों की बाजुएं फड़क उठती थी। आजादी के बाद भी उनकी कलम चलती रही और लोगों को जगाते रहे। भारत पर चीन के हमले के दौरान उनकी नज्म ( कविता)- ए मादरे हिंद तेरी अजमत को सलाम- सुनकर राष्ट्रपति डॉ जाकिर हुसैन भी भावविभोर हो गए थे।
सलीम खान बागवान
कलम व शायरी के जरिये लोगों को जगाने वालों में एक नाम सलीम खान बागवान का भी है। वे कौमी एकता और भाईचारे की जीती जागती मिसाल थे। उन्होंने अपने कलाम (काव्य) के जरिये लोगों में देशभक्ति का जज्बा पैदा किया और वातावरण निर्माण का काम करके योगदान दिया। आजादी के बाद भी वे पूर्व विधायक स्वरूप नारायण पुरोहित के सानिध्य में काम करते रहे।
नजर मोहम्मद पठान
सन- 1938 में जयपुर और सीकर के बीच खूनी जंग छिड़ी हुई थी। जयपुर पुलिस की कमान आईजी अंग्रेज सेनानी ंिमस्टर यंग ने संभाल रखी थी। उसने 5 जुलाई 1938 को सीकर में भयंकर गोलीकांड को अंजाम दिया। इसमें सीकर के चार योद्धाओं को शहादत देनी पड़ी। इसमें नजर मोहम्मद पठान ने अंतिम सांस तक बहादुरी से यंग की सेना का मुकाबला किया और गोलियों से छलनी कर दिए गए। उनके साथ जगन्नाथ पुरोहित, भंवरलाल कायस्थ व सरदार जी कासली वालों को भी मौत के घाट उतार दिया गया था। उनका नाम आज भी बहादुरी और देश की वफादारी के लिए इज्जत से लिया जाता है।
रियासतकाल के जाबांजमिश्री खान कायमखानी
मिश्री खान कायमखानी सीकर के शासक देवीसिंह के वफादार सेनानी थे। संवत 1836 में मुगलिया सल्तनत के सिपहसालार मुर्तजा भड़ेच ने शेखावाटी पर हमला कर दिया था। सावन पूर्णिमा के दिन खाटू के खेत में उसका सामना सीकर के राव राजा देवीसिंह व नागा पलटन के महंत मंगलनाथ ने बहादुरी से किया। इस जंग में देवी सिंह के सिपहसालार मिश्री खान कायमखानी बहादुरी के साथ लड़े और देवीसिंह व सीकर को बचाते हुए शहादत दे दी। उनकी वतनपरस्ती में न तो धर्म आड़े आया और न ही उनके हम मजहब मुर्तजा भड़ेच की चालें।
बहलोल खां पठान
रियासत काल में अपनी बहादुरी व जां निसारी के लिए मशहूर बहलोल खां पठान मजबूत कद- काठी के जांबाज सेनानी थे। सीकर के गढ़ में नजर बाग स्थित जुबली हॉल कोठी के बाएं भाग में एक मजार बनी हुई है, वह बहलोल खां की है। सीकर के चौथे शासक नाहरसिंह के वफादार सैनानी थे। स्वामी भक्ति और बहादुरी के लिए मशहूर बहलोल खां ने नाहरसिंह के नाना चांदसिंह को बचाने के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया था। राव चांदसिंह ने उनको इज्जज के साथ गढ़ में सुपुर्दे खाक करवाया था।