कभी खंडेला की देशभर में पहचान मजबूत करने वाला गोटा उद्योग अब संरक्षण के अभाव में दम तोड़ रहा है।
सीकर. कभी खंडेला की देशभर में पहचान मजबूत करने वाला गोटा उद्योग अब संरक्षण के अभाव में दम तोड़ रहा है। सरकार की ओर से भी गोटा उद्योग के संरक्षण को लेकर खूब दावे-वादे किए। लेकिन अभी तक गोटा उद्योग को कोई संजीवनी नहीं मिल सकी है। दरअसल, खंडेला में लगभग सौ वर्ष पहले यहां के नजीर बिसायती ने शहर से गोटा लाकर बेचना शुरू किया था। फिर उन्होनें बाजार से एक गोटा मशीन लाकर गोटे का उत्पादन भी शुरू कर दिया। लोगों को रोजगार मिलने लगा तो धीरे-धीरे मशीनों की संख्या भी बढऩे लगी। एक व्यक्ति 8 से 10 मशीन आराम से चला सकता था। उस दौर में कस्बे की 80 फीसदी आबादी इस उद्योग से जुड़ गई। यहां तैयार होने वाला फूल, बिजिया, चटाई, आकड़ा, लहर, प्लेन, गोटा चरखी, किरण का फूल, स्टार फूल व पत्ती सहित अनेक प्रकार का गोटा राजस्थान के अलावा दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, गुजरात व उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों तक पहुंचने लगा। गोटे के रूप व डिजाइन में आए बदलाव, जरी का काम बढऩे व सरकार की ओर से उन्हें सहायता व नई तकनीक की जानकारी नही देने के कारण यह उद्योग अब धीरे-धीरे बंद होने के कगार पर है। गोटा व्यापार संघ की ओर से इस उद्योग को जिन्दा रखने के लिए भरसक प्रयास किए गए पर वह भी इसमें ज्यादा सफल नही हो सके। अधिकांश मशीने अब कबाड़ बन चुकी है। लोगों ने बिजली के व्यावसायिक कनेक्शनों को या तो हटा दिया या फिर उन्हें घरेलू में बदलवा लिया है। पहले जहां दस से पन्द्रह हजार मशीने चला करती थी अब उनकी संख्या घटकर महज सौ के आस-पास ही सिमट कर रह गई। वर्तमान में कस्बे के व्यापारी सूरत से गोटा लाकर बेच रहे है जबकि कभी यहां से गोटा सूरत जाया करता था।
गोटा उद्योग का बंद होने के कगार पर पहुंचने का मुख्य कारण प्रशिक्षित कारीगरों की कमी रही। यहां के लोगों को नई तकनीक की जानकारी देने के लिए सरकार की ओर से भी कोई कदम नहीं उठाया गया। इससे नई डिजाइनों की जानकारी भी इन्हें नहीं मिल सकी। इसके अलावा गोटे को उत्पादन के बाद निर्यात नही होना भी रहा। साथ ही क्षेत्र में बिजली की कमी रही साथ ही इन मशीनों को चलाने के लिए बिजली की दर व्यवसायिक लगी वो दर यह वहन नही कर सके। शाम सात बजे बाद यातायात के साधनों की कमी की वजह से भी इस उद्योग पर असर आया। इससे उद्यमियों को माल सप्लाई में कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पडा़।
दिन प्रतिदिन आने वाली नई नई डिजाइनों व तकनीकों के लिए इनके प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए जाए। सरकार की ओर से इन उद्यमियों व कारीगरों के लिए अनुदान देने की पहल शुरू हो सकती है। वहीं गोटा उद्योग में काम आने वाली मशीनों के लिए बिजली कनेक्शन घरेलू रुप से जारी करने पर कुछ राहत मिल सकती है।