
त्रिलोक शर्मा...सिरोही. शिक्षा विकास का आधार होती है। इसमें भी प्राथमिक शिक्षा तो नींव की तरह है। यदि नींव ही कमजोर हो गई तो मजबूत भवन की उम्मीद बेमानी हो जाती है। दुर्भाग्य से सिरोही जिले के अधिकांश सरकारी विद्यालयों में ऐसा ही हो रहा है। इनमें आधारभूत ढांचे से लेकर अध्यापकों तक की कमी है। एक अध्यापक पांच से आठ कक्षाएं संभाल रहा है। ऐसी स्थिति के कारण ही अभिभावक सरकारी स्कूलों में बच्चों का दाखिला करवाने से परहेज करते हैं और प्राइवेट स्कूलों को प्राथमिकता देते हैं। गरीब तबके के ग्रामीण तो ऐसा भी नहीं कर सकते। चार वर्षों से बिना अध्यापक चल रहा स्कूल..., खराब परिणाम पर स्कूल पर लगाया ताला..., शिक्षकों की कमी के कारण पढ़ाई प्रभावित... शीर्षक से प्रकाशित खबरें हैरान करती हैं। साथ ही, सरकार व शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान भी लगाती हैं। आखिर सरकार को स्कूलों में अध्यापक की व्यवस्था करने के लिए कितना वक्त चाहिए? क्या सरकार इतनी मजबूर है कि अध्यापक भी नियुक्त नहीं कर सकती? कुछ जगह भामाशाह या ग्रामीण स्वयं के स्तर पर वेतन देकर अध्यापक रखते हैं। दूर-दराज के कई विद्यालय तो ऐसे हैं जहां शिक्षक माह में पांच-सात दिन ही जाते हैं।
भटाणा क्षेत्र के पादर का आदर्श राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय शिक्षकों की कमी से जूझ रहा है। छात्रों ने शनिवार को स्कूल पर ताला लगाकर प्रदर्शन किया। पहली से बारहवीं तक २५० बच्चे होने के बावजूद केवल छह शिक्षक की कार्यरत हैं। इससे शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है। ग्रामीणों ने जिला शिक्षा अधिकारी को चेतावनी तक दे डाली कि सात दिन में व्यवस्था नहीं हुई तो अब जिला मुख्यालय पर प्रदर्शन करेंगे। गांवों के विद्यालयों में सुविधा के नाम पर नेताओं के बयान गैर जिम्मेदाराना ही प्रतीत होते हैं। रेवदर विधायक विधायक का यह कहना कि अभी मंत्री से दूरभाष पर सम्पर्क कर वैकल्पिक व्यवस्था करवाता हूं..., समस्या को टालने जैसा ही है। बारह कक्षाओं के लिए कमरे केवल पांच ही हैं। अधिकारी नए कमरों की स्वीकृति के लिए प्रस्ताव भेजने की बात कहते हैं। पिछले दिनों आबूरोड के बहादुरपुरा के उच्च माध्यमिक विद्यालय का खराब परिणाम और कमरों की कमी को लेकर अभिभावक व छात्र गेट पर ताला जड़कर आगे बैठ गए। बोर्ड परीक्षा में इस वर्ष दो-तीन बच्चे ही उत्तीर्ण हुए। इसके बावजूद विभाग की ओर से लापरवाह शिक्षकों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है। विभागीय अधिकारियों के लिखित आश्वासन पर ग्रामीण माने। आखिर सवाल यह है कि शिक्षा के प्रति यह नकारात्मक रवैया क्यों है? सरकारी नीतियों में शिक्षा को कभी प्राथमिकता नहीं मिल सकी। ये भी मात्र वोट बटोरने का जरिया ही बनी रही। सरकार क्यों नहीं अधिकारियों के बच्चों को सरकारी विद्यालयों में पढ़ाने के लिए अनिवार्यता लागू करती?
स्कूलों की खस्ता स्थिति पर न तो जिले के अधिकारी ध्यान दे रहे हैं और न ही जनप्रतिनिधि। शिक्षा को अधिकार बना देने मात्र से क्या बात बन जाएगी? शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार किस तरह से आएगा? क्या लोग बच्चे को उन्हीं स्कूलों में भेजेंगे जहां आठवीं में पहुंचकर भी वह दूसरी कक्षा की किताबें नहीं पढ़ पाएगा? लगता है खानापूर्ति के लिए कक्षाएं चल रही हैं और शिक्षकों को तनख्वाह मिल रही है। आखिर क्यों इसकी जवाबदारी कोई नहीं ले रहा है? जिन विद्यालयों में कक्षा की किताबें न पढ़ सकने वाले बच्चे मिलें, वहां शिक्षकों की बर्खास्तगी होनी चाहिए।
बहरहाल, सभी शिक्षक स्तरहीन नहीं है। स्कूली शिक्षकों के लिए हर वर्ष परीक्षा की व्यवस्था की जाए तो अधिकांश के ज्ञान का स्तर सामने आ जाएगा। सरकारी स्कूल के शिक्षकों के सामान्य ज्ञान संबंधी वीडियो सोशल मीडिया पर आते रहते हैं। सरकार को रोज विद्यालय नहीं आने वाले अध्यापकों से सख्ती से पेश आना चाहिए।