जो आदिवासी काश्तकार पहले खेती के नाम पर खेतों में सिर्फ मक्का उगाते थे, वे आज हरी सब्जियां उगाते हैं। खास तौर पर महिला काश्तकार खेत के साथ पॉलीहाउस में भी तरह-तरह सब्जियां उगाती हैं। बेचने के लिए शहर की थोक-मंडी में आती है और जेब में रोजाना दो सौ-चार सौ रुपए नगद डालकर जाती हैं।
जो आदिवासी काश्तकार पहले खेती के नाम पर खेतों में सिर्फ मक्का उगाते थे, वे आज हरी सब्जियां उगाते हैं। खास तौर पर महिला काश्तकार खेत के साथ पॉलीहाउस में भी तरह-तरह सब्जियां उगाती हैं। बेचने के लिए शहर की थोक-मंडी में आती है और जेब में रोजाना दो सौ-चार सौ रुपए नगद डालकर जाती हैं। बच्चों के लिए फल, मिठाइयां व खिलौने खरीद कर जाती हैं तो अलग ही आनंद की अनुभूति करती हैं। बूंद-बूंद सिंचाई पद्धति व फव्वारा पद्धति से सिंचाई करती हैं। पशुपालकों ने भैंसों, गायों व बकरियों की सुरक्षा के लिए भंैस-घर व बकरी घर बना लिए हैं। कमाई के लिए अब ग्रीन हाउस नर्सरी व मुर्गी पालन की ओर भी ध्यान केन्द्रित किया है। खास तौर पर यह सब बीपीएल व नोन-बीपीएल परिवारों की उन ग्रामीण महिलाओं का कमाल है जो गरीबी शमन के लिए वर्ष-2009 में लागू की गई 'एमपॉवरÓ परियोजना के तहत गठित स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हुई है और आजीविका के साधन बढ़ाने के लिए कठोर परिश्रम का और कोई विकल्प नहीं मानती है।
तीस पंचायतों में बदल गई तस्वीर
एमपॉवर की बदौलत ब्लॉक की बत्तीस में से सांतपुर व ओरिया पंचायत को छोड़कर तीस पंचायतों में आजीविका के साधनों की तस्वीर बदल गई है। बीस गांवों में स्वयं सहायता समूहों ने बीस पॉलीहाउस बना लिए हैं। पशुपालकों के 289 भैंस-घर व 1125 बकरी-घर बने हुए हैं। 56 ड्रीप इरिगेशन सिस्टम व 132 स्प्रींकलर लगे हुए हैं। करीब दो दर्जन कृषि कुओं पर ट्रेलिज लगे हुए है, जिन पर चढ़ी बेलों पर तोरई, लौकी, करेले, अंगूर, टमाटर आदि लटकते नजर आते हैं। अब सौ खेतों में ग्रीन हाउस लगाने की तथा मुर्गी पालन के लिए सौ मुर्गी पालन केन्द्र स्थापित करने की योजना प्रस्तावित है, जो दिसम्बर तक बनकर तैयार हो जाएगा।
सोच में बदलाव बड़ा फायदा
'एमपॉवरÓ के तहत गठित चार सौ अस्सी स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं का कहना है कि एसएचजी से जुडऩे के बाद आर्थिक स्तर पर तो बदलाव आया ही है, सामाजिक व व्यक्तिगत स्तर पर भी बड़ा बदलाव आया है, जो उनके जीवन में अहम भूमिका निभा रहा है। मसलन पहले जो महिलाएं जंगल से लकडिय़ां बीनकर लाकर बेचती थी या बाजार में हथकढ़ी शराब बेचती थीं, उनमें से कइयों के सोच में बदलाव आने से वे पूरी मुस्तैदी से खेती में जुट गई है। हरी सब्जियां उगाकर बेचती है। पशुपालन कर दूध-घी बेचती है। अच्छी खासी कमाई होने से घरों में सुख-सुविधा व मनोरंजन के साधन बसाने शुरू किए है। बच्चों को पढ़ाने की पक्की मानसिकता बना ली है।
शराबबंदी की मुहिम से जुड़ी महिलाएं
सांगणा की मीराबेन गरासिया ने बताया कि इनदिनों जो शराबबंदी लागू कराने की मुहिम चल रही है, उससे जो महिलाएं जुड़ी है उनमें से अधिकतर ÓएमपॉवरÓ के तहत गठित स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हुई है। कठोर परिश्रम से आजीविका के साधन बढ़ाने वाली महिलाओं की मानसिकता व सोच में बदलाव का यह ताजा उदाहरण है। महिलाओं की समझ में आ गया है कि अब सिर्फ मक्का उगाकर या जलाऊ लकडिय़ां बेचकर या शराब बेचकर कल्याण नहीं हो सकता। इसके लिए 'एमपॉवरÓ सरीखी योजनाओं का लाभ उठाकर कठोर परिश्रम कर घर-संसार को संवारने की जरूरत है।
इन्होंने बताया ...
गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले सैकड़ों परिवारों के जीवन स्तर में गुणात्मक सुधार आया है। 'एमपॉवरÓ योजना का प्रमुख उद्देश्य भी ऐसे लोगों के लिए टिकाऊ आजीविका के अवसर सृजित करना व आमदनी में इजाफा करना है। परियोजना से लाभान्वित महिलाओं का जीवन वाकई खुशहाल हो गया है।
- अरविंद गोदावत, प्रोजेक्ट मैनेजर, एमपॉवर, आबूरोड।