सिरोही

देखरेख के अभाव में परम्परागत जलस्रोतों का अस्तित्व खतरे में

मंडार. देखरेख के अभाव में परम्परागत जलस्रोतों का अस्तित्व खतरे में नजर आ रहा है। एक जमाना था जब इन जलस्रोतों पर पनिहारी के पायल की छमछम दूर-दूर तक सुनाई देती थी। गांव की महिलाएं मटका लेकर इन जलस्रोतों पर पहुंचती थी तो एक अलग की रौनक देखने को मिलती थी लेकिन आज ये सब गायब सी हो गई है।
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Apr 05, 2019
sirohi
देखरेख के अभाव में परम्परागत जलस्रोतों का अस्तित्व खतरे में

मंडार. देखरेख के अभाव में परम्परागत जलस्रोतों का अस्तित्व खतरे में नजर आ रहा है। एक जमाना था जब इन जलस्रोतों पर पनिहारी के पायल की छमछम दूर-दूर तक सुनाई देती थी। गांव की महिलाएं मटका लेकर इन जलस्रोतों पर पहुंचती थी तो एक अलग की रौनक देखने को मिलती थी लेकिन आज ये सब गायब सी हो गई है। इन कुओं व बावडियों पर हर समय महिलाओं का जमावड़ा रहता था। रस्सी से बंधी बाल्टी से बावड़ी में पानी भरने की होड़ हुआ करती थी। लेकिन आज यहां सन्नाटा पसरा हुआ है। यहां ग्रामीणों को पेयजल के लिए रियासतकाल में बने पेयजल के प्रमुख स्रोत खारीवाव, मीठीवाव समेत आधा दर्जन से अधिक बावडिय़ा प्रशासन की अनदेखी से आंसू बहा रही है। खारीवाव व मीठीवाव अतिक्रमण की भेंट चढ़ गई है। ऐसे में इनके अस्तित्व पर ही खतरा मंडरा रहा है। बडला चौक के पास अतिप्राचिन खारीवाव पर किसी जमाने में रौनक रहती थी लेकिन करीब डेढ़ दशक पूर्व पंचायत की ओर से गांव में जगह-जगह पेयजल टंकियों का निर्माण करवा दिया गया। ऐसे में इन जलस्रोतों की उपयोगिता घट गई। बाद में राख-रखाव सही नहीं होने से अनुपयोगी बन गई। रेबारियों का गोलिया स्थित बावड़ी भी बारिश में धंसने से आधा अस्तित्व खो चुकी है। वहीं रंगरेज बाव को करीब डेढ दशक पूर्व पंचायत ने ही रेत से पटवाकर समतल करवा दिया था। जिसका नामों निशान नहीं है।

Updated on:
05 Apr 2019 08:16 pm
Published on:
05 Apr 2019 08:16 pm