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भारत की वायुसेना करती है देश का सुरक्षा कवच तैयार, जानिए कैसे

भारत की सुरक्षा में देश की वायुसेना अहम भूमिका निभाती है। पर क्या आपको पता है कि वायुसेना की रक्षा प्रणालियाँ कैसे देश का सुरक्षा कवच तैयार करती हैं? आइए जानते हैं।

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May 16, 2025
Indian Air Force

हाल में 'ऑपरेशन सिंदूर' (Operation Sindoor) के बाद भारतीय सेना की उपलब्धियों और कामयाबी को लेकर हुई ब्रीफिंग के दौरान भारतीय वायुसेना (Indian Air Force) के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम की तस्वीर साझा की गई जिसमें युद्ध जैसी स्थिति में पाकिस्तान से आने वाले हवाई खतरों को रोकने के लिए तैनात वायु रक्षा प्रणाली की रीयल-टाइम मॉनिटरिंग को दुनिया के सामने लाया गया। इस आधुनिक प्रणाली को वायु सुरक्षा संरचना की रीढ़ माना जा रहा है। आइए जानते हैं कि कैसे काम करती है यह प्रणाली।

बहुस्तरीय ड्रोन-रोधी और वायु रक्षा ग्रिड

पहली सुरक्षा परतः काउंटर ड्रोन का एमएएन-पीएडीएस।
दूसरी सुरक्षा परतः पॉइंट एयर डिफेंस और शॉर्ट रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइलें।
तीसरी सुरक्षा परतः मीडियम रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइलें।
चौथी सुरक्षा परतः लॉन्ग रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइलें।

आकाशतीर प्रणाली और आइएसीसीएस के साथ इसकी नेटवर्किंग

इससे अंतर्राष्ट्रीय सीमा से 200 किलोमीटर के दायरे में बहुस्तरीय सुरक्षा चक्र तैयार होता है। इस प्रणाली से और क्या फायदा होता है? आइए नज़र डालते हैं।

सर्विलास रडार।
मीडियम रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइलें।
काउंटर ड्रोन एंड एमएएन-पीएडीएस।
लॉन्ग रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइलें।
शॉर्ट रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइलें।

आकाशतीर

भारतीय थल सेना ने आकाशतीर नामक प्रणाली विकसित की है। वर्तमान में यह सीमित पैमाने पर काम कर रही है। इसका उद्देश्य युद्ध क्षेत्र में निम्न स्तरीय हवाई क्षेत्र की निगरानी और जमीनी वायु रक्षा हथियारों का संचालन करना है। इसे आइएसीसीएस से जोड़े जाने की प्रक्रिया चल रही है ताकि वायुसेना और थलसेना की वायु रक्षा गतिविधियाँ समन्वित हो सकें।

भारतीय वायु रक्षाः बहुस्तरीय ढांचा

पहली परत में काउंटर ड्रोन सिस्टम और मेन पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम्स (एमएएन-पीएडीएस) आते हैं।

दूसरी और तीसरी परत में शॉर्ट रेंज और मीडियम रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइलें तैनात हैं।

चौथी परत में लॉन्ग रेंज मिसाइल सिस्टम हैं जो बड़े क्षेत्र को कवर करते हैं।

भारतीय वायुसेना के आधुनिक रडार

इनमें हवा में रहने वाली रडार प्रणालियाँ एडब्लूएसीएस (एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम) और एईडब्लूएंडसी (एयरबोर्न अली वार्निंग एंड कंट्रोल) और जमीनी रडार शामिल हैं। आइएसीसीएस नेटवर्किंग के साथ ये प्रणालियाँ घुसपैठियों की पहचान, उनका पता लगाने और उन्हें निष्क्रिय करने में अहम भूमिका निभाते हैं।

वायु रक्षा क्षेत्र में अहम कदम

बीते कुछ वर्षों में भारतीय वायुसेना ने हर मोर्चे पर वायु रक्षा प्रयासों को अपग्रेड किया है, जिसमें रडार और सतह से हवा में मार करने वाले गाइडेड वेपन प्रणालियों की उपस्थिति को बढ़ाया गया है। साथ ही आइएसीसीएस नेटवर्क में एकीकृत भी किया गया है। निकट भविष्य में आइएसीसीएस तीनों सेनाओं के और सुदृढ़ एकीकरण में मदद करेगा।

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