
श्रीगंगानगर.
रियासतकाल में दी गई एक जिम्मेदारी श्रीगंगानगर शहर में गणगौर की परम्परा बन गई । कुछ इसी तरह से श्रीगंगानगर में आई गणगौर की परम्परा। रियासत काल में जब श्रीगंगानगर की स्थापना हुई तो इसके कुछ ही वर्ष बाद शहर में परम्पराएं विकसित करने की तैयारी की गई। ऐसे में तत्कालीन बीकानेर राजघराने से हर इलाके के प्रमुख लोगों को प्रमुख जिम्मेदारियां दी गई। उसी दौरान श्रीगंगानगर में यह जिम्मेदारी दी गई गीदड़ा परिवार को। इस परिवार ने इस जिम्मेदारी को निभाया और अब तक इसका निर्वहन निर्बाध हो रहा है। परम्परा की शुरुआत इस परिवार के सेठ लच्छीराम गीदड़ा के बड़े भाई सेठ सोहनलाल गीदड़ा ने की। तब से यह परिवार लगातार गणगौर की सवारी निकाल रहा है।
लगातार निभा रहे हैं परम्परा
सेठ लच्छीराम गीदड़ा के पुत्र बृजलाल गीदड़ा बताते हैं कि उनके परिवार को उस समय राजघराने से निर्देश मिलेथे। तब राजपरिवार ने इलाके का प्रमुख परिवार मानते हुए उन्हें यहां होलिका दहन और गणगौर की सवारी निकालने का दायित्व दिया जिसे उनके ताऊ सेठ सोहनलाल गीदड़ा ने स्वीकार किया और पहली बार अपने घर से गणगौर की सवारी निकाली और इसे महावीर दल मंदिर तक ले गए। तब से वर्तमान तक महावीरदल मंदिर में उनके यहां क गणगौर जाती है। अब भी गीदड़ा परिवार के जवाहर नगर स्थित आवास से यह सवारी निकाली जाती है।
बीकानेर से आई दादी बामणी की गणगौर
जहां गीदड़ा परिवार की गणगौर रियासत काल से शुरू हुई वहीं वर्ष 1968 में श्रीगंगानगर आए एक परिवार ने भी शहर में गणगौर की परम्परा जोड़ी। शहर में यह गणगौर की परम्परा ले कर आई बीकानेर की आशा देवी। आशा देवी के पुत्र शंकर महाराज ने बताया कि उनके बड़े भाई को उनकी नानी ने यह गणगौर भेंट की थी तथा उस समय बीकानेर राजघराने की गणगौर की सवारी में भी यह गणगौर शामिल होती थी। बाद में आशा देवी इसे श्रीगंगानगर ले आई। यहां शुरुआत में सी ब्लॉक में गोशाला रोड के पास से यह सवारी निकलती थी तथा इसे महावीर दल मंदिर में ले जाया जाता लेकिन अब यह गणगौर जवाहर नगर में आशा देवी के पुत्रों के आवास से निकलती है तथा महावीर दल मंदिर तक जाती है।