श्री गंगानगर

खेती से आगे अब अश्व पालन का जुनून–श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ के युवा बना रहे शौक को व्यवसाय

कृषि के साथ जुड़ता नया व्यवसाय—नशे से दूरी, शौक से रोजगार तक पहुंचा युवाओं का जुनून; अश्व मेले में लाखों कीमत के घोड़े और परंपरा के साथ आधुनिकता का संगम

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  • श्रीगंगानगर.कभी सिर्फ खेती तक सीमित रहने वाला श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ का किसान अब नई दिशा में कदम बढ़ा रहा है। खेतों की मेड़ों से निकलकर अब वे अस्तबलों तक अपनी पहचान बना रहे हैं। क्षेत्र में अश्वपालन का चलन तेजी से बढ़ रहा है,खासतौर पर युवाओं में। नशे से दूरी और आत्मनिर्भरता की राह पर ये युवा घोड़ों के शौक को रोजगार में बदल रहे हैं। उनके इसी जुनून की झलक पदमपुर बाइपास पर चल रहे 23 वें अश्व मेले में देखने को मिल रही है,जहां सैकड़ों घोड़े, बड़ी संख्या में दर्शक और लाखों की कीमतों की चर्चाएं हैं।
  • विदित है कि कृषि प्रधान इस इलाके में अब घोड़ों की हिनहिनाहट नई उम्मीदों की गूंज बन चुकी है और जहां परंपरा और आधुनिकता साथ-साथ चल रही हैं।

खरीद-फरोख्त का दौर शुरू

  • इस बार मेले में 200 से अधिक अश्व अभी तक पहुंचे हैं और खरीद-फरोख्त का दौर लगातार जारी है। यूपी, दिल्ली, गुजरात सहित कई राज्यों से व्यापारी उच्च नस्ल के घोड़े खरीदने पहुंचे हैं। श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, बीकानेर, नागौर, पंजाब, हरियाणा और महाराष्ट्र के अश्वपालक अपने शानदार घोड़े-घोडिय़ा व बछेरे लेकर मेले में पहुंचे हैं। नुकरा, मारवाड़ी और सिंधी नस्लों के घोड़े मेले में सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। सफेद चमकदार नुकरा नस्ल की घोड़ी की कीमत 2 से 15 लाख रुपए तक बताई जा रही है, जबकि काले मारवाड़ी घोड़े की कीमत 5 लाख से 60 लाख रुपए तक पहुंच चुकी है।

मारवाड़ी घोड़ा पहली पसंद

  • गांव 5 बी के युवा अश्वपालक अर्जुन बिश्नोई कहते हैं मारवाड़ी घोड़ा ताकत, सौंदर्य और स्वभाव में बेजोड़ है। यह हमारा शौक भी है और आय का साधन भी। वहीं गांव 18 जीजी के किसान रामदेव झाझडिया अपनी नुकरा नस्ल की घोड़ी और बछेरे के साथ मेले में पहुंचे हैं। वे बताते हैं हम छह-सात साल से अश्वपालन कर रहे हैं। यह हमारे परिवार की परंपरा है और मेरा बेटा अंश भी घुड़सवारी का शौक रखता है।अश्वपालकों का कहना है कि घोड़ों की देखभाल आसान तो नहीं होती,लेकिन असंभव भी नहीं। नियमित खानपान,साफ-सफाई और उचित प्रशिक्षण से इनकी अच्छी तरह सार-संभाल की जा सकती है।

अश्व मेला का इतिहास

  • करीब 23 वर्ष पहले कुछ किसानों के सहयोग से शुरू हुआ यह अश्व मेला अब श्रीगंगानगर की पहचान बन चुका है। महाराणा प्रताप घोड़ा पालक समिति के वरिष्ठ सदस्य लक्ष्मण सिंह बताते हैं कि पहला मेला सद्भावना नगर में आयोजित किया गया था। अब हर साल गुरु नानक जयंती के अवसर पर पदमपुर बाइपास पर सात दिन के लिए अश्व मेला का यहां पर आयोजन होता है।

अश्वों की कीमत

  • नुकरा: 2 से 15 लाख
  • काला मारवाड़ी: 5 लाख से 60 लाख
  • चंबा : 2 से 4 लाख

अश्वों की नस्लों की पहचान

  • नुकरा: पूरा सफेद रंग
  • चंबा: चारों पैर व मुंह सफेद
  • काला: पूरा शरीर काला
  • कुमैत: शरीर में लालिमा झलकती
  • सब्जा: शरीर पर थोड़े-थोड़े सफेद बाल
Published on:
11 Nov 2025 11:51 am
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