-लैला मजनू के वार्षिक मेले का शुभारम्भ
अनूपगढ.
भारत-पाक अंर्तराष्ट्रीय सीमा पर स्थित गांव 6एमएसआर बिंजौर दो प्रेमी जोडों की अमर कहानी का गवाह बना। यह प्रेमी जोडे थे लैला-मजनू। यह बिंजौर गांव श्रीगंगानगर जिले की अनूपगढ तहसील में स्थित है। इस गांव में 2 मजारे है,इनमें से एक लैला तो एक मजनू के नाम से मशहूर है। लैला मजनू के अमर प्रेम से सारी दुनिया वाकिफ है, कहा जाता है कि लैला मजनू ने गंगानगर जिले की अनूपगढ़ तहसील की इसी धरती पर प्यास से तडप तडप कर जान दे दी थी। यह कहना गलत नही होगा कि रेतीले धोरो में दफ़ न है मोहब्बत की वो दर्दनाक दांस्ता। जहां एक प्रमी जोडे ने एक दूसरे के लिए अपने प्राण त्याग दिए थे। यह भी कहा जाता है कि उस समय यहां दूर दूर तक रेत के टीले थे जीवन कहीं नजर ही नही आता था। इन्ही मजारों पर अमर प्रेम के प्रतीक लैला मजनू का हर वर्ष मेला भरता है। लैला मजनू की मजार पर प्रेमी अपने प्यार के सलामती की दुआ मांगने आते है।
इन्ही मजारों को यहां के लोग लैला और मजनू के प्यार की निशानी (मजारे)बताते है। अब यहां की आबो हवा बदल गई है, नहर आने से यह इलाका खुशहाल हो गया है, अब यह इलाका रेगिस्तानी नही रहा है। लोगों ने इन रुहों को अमर बनाए रखने के लिए यहां हर वर्ष मेला लगााना शुरु कर दिया। मेले की बढ़ती मान्यता को बाद मेला में निरंतर लगाने तथा मेले मे सारी व्यवस्थाएं सम्भालने के लिए कमेटी का गठन किया गया। जो कमेटी आज तक मेले के प्रबंधन का कार्य देखती है। सरकार द्वारा भी इसे प्रर्यटन स्थल बनाने के लिए प्रयास किए गए है। इस वर्ष भी प्रेमी जोड़े लैला मजनू की मजारों पर लगने वाले मेले की तैयारियां जोरो शोरो से चल रही है। मेला कमेटी के प्रधान बलजीत सिंह कोशाध्यक्ष गणपत राम सचिव चरण सिंह सहित अन्य कार्यकारिणी ने बताया कि इस वर्ष मेला 11 जून से 15 जून तक चलेगा। उन्होंने बताया कि मेले में हर वर्ष की तरह इस बार भी बाहर से आए कलाकारों द्वारा अखाड़ा लगाकर लोगों का मनोरंजन किया जाएगा। इसके अलावा कुश्ती ओपन कब्बडी बॉलीबाल प्रतियोगिता के आयोजन के साथ साथ महिला कब्बडी प्रतियोगिता आयोजित करवाई जाएगी।
कांटो ने रोकी प्रमियों की राह
इस मजार पर मेला भारत-पाक विभाजन से पहले भी लगता रहा है।विभाजन हुआ तो पाकिस्तान बना,मगर तब तक पाकिस्तान आने जाने में रोक कम थी तो यहां काफी संख्या में पाकिस्तान से भी लोग तथा प्रेमी जोड़े मन्नत मांगने के लिए आते थे। मगर पाकिस्तान की नापाक हरकतों सीमा क्षेत्र की में तारबंदी करने पर मजबूर कर दिया। सीमा पर बीएसफ़ की चौकसी भी बढ़ा दी गई। ऐसे में पाकिस्तान से आने वाले प्रेमियों व श्रद्धालुओं का यहां आना बंद हो गया। यह कहना गलत नही होगा कि पाक कि नापाक हरकतों से लगााई तार बंदी ने प्रमियों की राह पर लगाम लगाई है।
दिन-ब-दिन बढ़ रही मजारों की मान्यता
प्यार करने वाले जोड़े अपनी मोहब्बत को परवान चढाने,निसंतान दम्पति संतान सुख प्राप्त करने तो कोई अन्य श्रद्धालु अपनी अपनी मन्नतों के साथ यहां आते है। मान्यता है कि इन मजारों पर झोली फलाने वाले की झोली खुशियों से भर जाती है।मेले पर विशेष रूप से नवविवाहित जोड़े व अविवाहित युवक युवतीया आकर प्यार की मुरादे मांगते है। मान्यता है कि इन मजारों से दो दीप निकलते और सारे क्षेत्र का चक्कर लगा कर वापिस इन्ही मजारों में समां जाते है। लोग यह भी बताते है कि सदियों पहले यहां पर रात में रौशनी दिखाई दिया करती थी, जिसमे एक युवक तथा एक युवति की परछाई अक्सर नजर आया करती थी। इन मजारों के लिए यह बात भी प्रसिद्ध है कि घग्धर नदी में आने वाले पानी से पूरा इलाका डूब जाता था लेकिन पूरे उफान के बावजूद पानी इन मजारों को नही छू पाता था। लैला मजनू के नाम से प्रसिद्ध इन मजारों की मान्यता दिन बदिन बढ़ रही है पहले यह मेला एक दिन का लगा करता था लेकिन धीरे धीरे बढ़ती भीड़ के कारण मेला कमेटी ने इसे 5 दिन का कर दिया अभी भी मेले के अंतिम दो दिन बहुत ज्यादा भीड़ हो जाती है। हालांकि यह मजारे किसकी है इसका कोई अधिकारिक प्रमाण नही है, इनकी मौत कैसे हुई इसका भी कोई प्रमाण नही है।
आस्था तथा श्रद्धा की प्रतीक मज़ारे
लैला मजनू की मजारों के प्रति हिन्दू मुस्लिम सिक्ख तथा हर धर्म के लोग आस्था रखते है। वैसे तो रोज ही कोई ना कोई इन मजारों पर नमक पतासे झंडी आदि चढ़ाकर मन्नत मानते है लेकिन 11 से 15 जून के बीच पंजाब हरियाणा दिल्ली सहित राजस्थान के विभिन्न भागों से इन मजारों। पर अपनी मन्नत मांगने के लिए पहुंचते है और श्रद्धा से शीश नवाते है। भारत पाक अंर्तराष्ट्रीय सीमा पर स्थित मज़ारे हिन्दू मुस्लिम एकता का संदेश देती है।