- शहर के मटका चौक, इंदिरा चौक और मीरा मार्ग पर खूब बिके रंग बिरंगे मिटटी के बर्तन
श्रीगंगानगर। शहर में इस बार मिट़टी के बने दीयों और अन्य रंग बिरंगे बर्तन की खूब खरीददारी हो रही है। रवीन्द्र पथ पर मटका चौक के पास मिट्टी के दीयों की खरीदारी का उत्साह देखने को मिला। इस चौक पर धनतेरस की पूर्व संध्या रविवार को काफी संख्या में महिलाएं, बच्चे और युवा इस खास मौके का आनंद लेने के लिए जुट गए। दीपावली पर्व खुशियों, उल्लास और रोशनी का प्रतीक है, और इस अवसर पर मिट्टी के दीये खरीदना एक महत्वपूर्ण परंपरा मानी जाती है। दीपावली के दौरान लोग अपने घरों को सजाने के लिए कई प्रकार के दीयों का उपयोग करते हैं। मटका चौक पर बसे दुकानदारों और इंदिरा चौक के पास दुकानदारों ने इस विशेष अवसर के लिए विशेष रूप से रंग-बिरंगे और विविध डिज़ाइन के दीए तैयार किए हैं। इसकी वजह से ग्राहकों के लिए चुनाव की कोई कमी नहीं है। ग्राहकों में उत्साह देखकर यह साफ था कि हर कोई अपने घर के लिए कुछ खास और अनोखा खरीदने के लिए बेताब है। महिलाओं और बच्चों का विशेष ध्यान मिट्टी के दीयों पर था। अनेक दुकानों के सामने ग्राहकों की लंबी कतारें लगी थीं। कई महिलाएं समूह में आकर दीयों की खरीदारी कर रही थीं, जबकि बच्चे उत्साह में दीयों का चयन कर रहे थे। माता-पिता भी अपने बच्चों को योग्यतम दीया चुनने में मदद कर रहे थे। दुकानदारों ने बताया कि इस साल मिट्टी के दीयों की मांग गत वर्ष की तुलना में अधिक है, क्योंकि लोग प्राकृतिक और पारंपरिक वस्तुओं को तरजीह दे रहे हैं।
दुकानदार सत्यनारायण वर्मा का कहना था कि अभी लोग अपने पारंपरिक मूल्यों और संस्कृति को जिंदा रखने के लिए गंभीर हैं। मिट्टी के दीये न केवल इको-फ्रेंडली होते हैं, बल्कि ये हमारे दीयों के त्योहार की अनकही कहानी भी बयां करते हैं। वहीं
दुकानदार सोनू रानी का कहना है कि युवा पीढ़ी के बीच भी मिट्टी के दीयों के प्रति जुनून देखने को मिल रहा है। वे इसका उपयोग न केवल त्योहार के दौरान, बल्कि अपने घरों की सजावट के लिए भी कर रहे हैं। मिट़टी के दीये से कई फायदे भी हैं।
दुकान संचालिका विमला देवी का मानना है कि लोग मिट्टी के दीयों के प्रति सजग है। मटका चौक स्थानीय लोगों के लिए एक हब बन गया है, जहां पर परंपरा और आधुनिकता का संगम देखने को मिल रहा है। इधर, दुकानदार मूलाराम का कहना था कि धनतेरस की खास दिन पर मिट्टी के दीयों की खरीदारी सिर्फ एक क्रेज नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति से जुड़ाव और हजारों साल पुरानी परंपराओं को आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है हर कोई अपने-अपने तरीके से त्योहार की खुशियों का अनुभव करने में जुटा है।