- प्रदेश में श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ में सालभर चलती हैं एंटी लार्वा गतिविधियां, जल जमाव वाले स्थानों की नियमित निगरानी और दवाइयों की उपलब्धता से घटे मलेरिया रोगी
श्रीगंगानगर. एक समय ऐसा भी था जब जिले में मलेरिया रोग की गंभीरता को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग को अलग से सेल बनाना पड़ा था, लेकिन अब हालात धीरे-धीरे नियंत्रण में आते नजर आ रहे हैं। राज्य सरकार की ओर से संचालित मलेरिया क्रेश प्रोग्राम ने इस दिशा में प्रभावी भूमिका निभाई है। प्रदेश में श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिले के साथ बीकानेर के कुछ क्षेत्रों को नाली बैल्ट के रूप में चिन्हित कर इस विशेष कार्यक्रम के तहत शामिल किया गया। इन क्षेत्रों में सालभर पानी का ठहराव अधिक रहता है, ऐसे में एंटी लार्वा गतिविधियां संचालित की जा रही हैं, इससे मच्छरों की उत्पत्ति को शुरुआती स्तर पर ही नियंत्रित किया जा सके। स्वास्थ्य विभाग ने इस कार्यक्रम के तहत न केवल गांवों और नाली क्षेत्रों में दवा का छिड़काव कराया, बल्कि जल जमाव वाले स्थानों की नियमित निगरानी भी सुनिश्चित की। जिला अस्पताल से लेकर उप स्वास्थ्य केंद्रों तक मलेरिया की दवाइयों की पर्याप्त उपलब्धता पर भी विशेष ध्यान दिया गया। सरकार की ओर से इस योजना पर करोड़ों रुपए खर्च किए गए हैं, जिसका सकारात्मक परिणाम अब सामने आने लगा है। विदित रहे कि मलेरिया से पीड़ित व्यक्ति को तेज बुखार, ठंड लगना, उल्टी, मतली, पेट दर्द तथा शरीर में दर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं। आमतौर पर संक्रमित मच्छर के काटने के कुछ सप्ताह बाद लक्षण दिखाई देते हैं। यदि किसी व्यक्ति को लगातार चार-पांच दिनों तक बुखार बना रहता है, तो उसे तुरंत चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए। समय पर इलाज नहीं मिलने पर रोग गंभीर रूप ले सकता है।
फोकस की वजह से आई कमी
जिला अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक डा. अंकित लडढा का कहना है कि पूरे प्रदेश में श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ ऐसे जिले है जहां मलेरिया क्रेश प्रोग्राम पूरे साल संचालित होता है। ग्रामीण क्षेत्रों के उन स्थानों पर विशेष फोकस किया गया है, जहां पानी ठहरने से मच्छरों के लार्वा पनपते हैं। आशा सहयोगिनियों, एएनएम और नर्सिंग स्टाफ ने भी इस अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और जागरूकता फैलाने के साथ-साथ जमीनी स्तर पर कार्य किया है। इस समन्वित प्रयास का ही परिणाम है कि पिछले एक दशक की तुलना में अब मलेरिया के मामलों में उल्लेखनीय कमी आई है और केस सीमित रह गए हैं।
इसलिए बनाया जाता है यह दिवस
विश्व मलेरिया दिवस की नींव साल 2000 में 'अफ्रीका मलेरिया डे' के रूप में पड़ी थी। इसके महत्व को देखते हुए, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने साल 2008 में इसे वैश्विक स्तर पर मनाने का निर्णय लिया। तब से हर साल 25 अप्रैल को यह दिवस मनाया जा रहा है ताकि इस बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए सामूहिक प्रयास किए जा सकें।
इसलिए घटी मच्छरों की मारक क्षमता
एक्सपर्ट व्यू: बंशीधर जोशी, कीट विशेषज्ञ स्वास्थ्य विभाग श्रीगंगानगर
जिले में मलेरिया पर नियंत्रण केवल अभियानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके पीछे वैज्ञानिक रणनीति और मच्छरों के जीवन चक्र को समझकर की गई प्रभावी कार्रवाई भी अहम रही है। मलेरिया फैलाने वाले प्रमुख वाहक एनोफिलीज प्रजाति के मच्छर हैं, जिनमें एनोफिलीज स्टेफेंसी और एनोफिलीज क्युलिसिफ़ेसीज प्रमुख हैं। एनोफिलीज स्टेफेंसी मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों में पाया जाता है और कूलर, पानी की टंकियों, निर्माण स्थलों तथा अन्य स्थानों पर जमा साफ पानी में पनपता है। वहीं एनोफिलीज क्युलिसिफ़ेसीज ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक सक्रिय रहता है और नहरों के रिसाव, खेतों में जमा पानी और गड्ढों में प्रजनन करता है। ये मच्छर मुख्यतः रात के समय काटते हैं। ऐसे में मच्छरदानी, मॉस्किटो कॉइल, अगरबत्ती और तरल मच्छरनाशकों के उपयोग से इनके जीवन चक्र पर असर पड़ा है। रात में इन साधनों के इस्तेमाल से मच्छरों के काटने की संभावना कम होती है, इससे संक्रमण का खतरा भी घटता है। आमजन भी साफ-सफाई व बचाव के उपायों को अपनाएं, तो मलेरिया पर स्थायी नियंत्रण संभव है।
जिले में मलेरिया का गणित
वर्ष रोगी
2021 03
2022 14
2023 51
2024 46
2025 08
2026 अब तक एक नहीं