
79 साल बाद भी जिंदा है विभाजन का दर्द
Bश्रीगंगानगर. Bदेश का बंटवारा हुआ तो लाखों परिवारों के लिए आजादी का जश्न उजड़ने, बिछड़ने और जान बचाने की दौड़ में बदल गया। किसी ने अधपकी रोटी छोड़ी, किसी ने जेवर-सामान तो किसी ने अपना पुश्तैनी घर। हिंसा, लूट, भूख-प्यास और मौत के मंजर झेलकर भारत पहुंचे इन परिवारों ने शून्य से नई जिंदगी शुरू की। 79 साल बाद भी उनकी आंखों में उस विभाजन की पीड़ा और छूटे घर की यादें जिंदा हैं।
Bतंदूर पर रोटी चढ़ी थी... खाने से पहले ही छूटा लाहौर B
श्रीकरणपुर. 101 वर्षीय सरला चड्ढा ने बताया कि 14 अगस्त 1947 की दोपहर अचानक मां के धर्म भाई युसुफ मामा घर पहुंचे और तत्काल लाहौर छोडऩे को कहा। हालात ऐसे थे कि तंदूर पर चढ़ी रोटी वहीं छोडऩी पड़ी। कुछ ही देर में अपना घर, कारोबार, सामान और शहर पीछे छूट गया और 12 सदस्यीय परिवार मारकाट के बीच कराची मेल में सवार होकर अनजान सफर पर निकल पड़ा। चड्ढा ने बताया कि 12 अगस्त को कुछ लोग उनके घर में घुस आए। उस समय उनके पिता अफगानी वेशभूषा में थे। हमलावरों ने उन्हें मुस्लिम समझ लिया और परिवार को छोडक़र चले गए। इसके बाद परिवार ने लाहौर छोड़ने का फैसला किया। उन्होंने बताया कि लाहौर रेलवे स्टेशन तक पहुंचना भी किसी जंग से कम नहीं था। चारों ओर मारकाट का माहौल था। इसी दहशत के बीच 12 सदस्यीय परिवार कराची मेल में सवार हुआ। अमृतसर होते हुए परिवार दिल्ली पहुंचा और 15 दिन शरणार्थी कैंप में रहा। करीब पांच वर्ष पटना में रहने के बाद दिल्ली आया। बाद में विवाह के बाद सरला सूरतगढ़ आ बसीं।
Bघुड़सवार ने चेताया, जेवर-सामान वहीं छोड़कर आ गएB
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घड़साना. चक 2 एसटीआर ढाणी निवासी 96 वर्षीय भाग सिंह जटसिख और 86 वर्षीय गुरदेव कौर ने विभाजन का भयावह दौर बचपन में देखा। उस समय भाग सिंह करीब 16 और गुरदेव कौर 6-7 वर्ष की थीं। उनका परिवार बहावलपुर के रतीराम गांव में रहता था। पिता अरजन सिंह खेती-बाड़ी और पशुपालन करते थे। परिवार के पशुओं की देखभाल करने वाले एक मुस्लिम युवक ने हालात बिगड़ने की चेतावनी दी और गांव छोड़ने को कहा। कुछ ही समय बाद भोलेवाला मंडी का एक आढ़ती घोड़े पर सवार होकर घर पहुंचा और तत्काल सुरक्षित जगह जाने की सलाह दी। परिवार ने बैलगाड़ी में जरूरी सामान रखा और श्रीकरणपुर के पास चुनावढ़ स्थित रिश्तेदारों के घर निकल पड़ा। उन्हें उम्मीद थी कि पांच-सात दिन में हालात सुधर जाएंगे और वापस लौट आएंगे। इसी भरोसे में सोने-चांदी के जेवर और घर का काफी सामान वहीं छोड़ दिया, लेकिन वापसी कभी नहीं हुई।
Bरास्ते में ऊंट, नकदी और गहने तक छीन लिए गएB
अनूपगढ़. वर्ष 1947 में आठ वर्षीय घनश्याम दास चुघ का परिवार फोर्ट अब्बास में रहता था। 14 अगस्त की रात हालात बिगड़े तो छह सदस्यीय परिवार घर छोड़कर भारत की ओर निकल पड़ा। घनश्याम को समझ नहीं था कि घर क्यों छोड़ा जा रहा है, लेकिन बड़ों के चेहरों का डर सब कुछ बता रहा था। परिवार जरूरी सामान ऊंट पर लादकर निकला। रास्ते में लूट और हिंसा का ऐसा डर था कि हर कदम पर जान का खतरा बना रहा। घनश्याम बताते हैं कि रास्ते में ऊंट, सामान, नकदी और गहने तक छीन लिए गए। भूखे-प्यासे परिवार के पास आगे बढ़ने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। करीब 16-18 किलोमीटर का यह सफर उनके लिए जिंदगी बचाने की दौड़ था। अगले दिन परिवार अनूपगढ़ पहुंचा। यहां रिश्तेदारों ने सहारा दिया और किराने की छोटी दुकान से कारोबार शुरू कराया। खाली हाथ आए परिवार ने मेहनत के बल पर अनूपगढ़ को अपनी नई कर्मभूमि बना लिया।
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Bनहरों में पानी की जगह बहता था खून B
सूरतगढ़. 90 वर्षीय लक्ष्मण भटेजा आज भी विभाजन का वह सफर नहीं भूल पाए हैं। उनका परिवार पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के जमन शाह कस्बे में रहता था और किराने का कारोबार करता था। 1947 में हालात बिगड़े तो सैन्य कर्मियों ने लोगों को हिंदुस्तान चले जाने की सलाह दी। इसके बाद परिवार लंबी पैदल यात्रा पर निकल पड़ा। रास्ते में पानी तक नसीब नहीं था। लक्ष्मण बताते हैं कि लोग बारिश का पानी भी जमीन पर मुंह लगाकर पीने को मजबूर थे। रात करीब 12 बजे काफिला सुलेमान हैड के पास पहुंचा तो चारों ओर लाशें पड़ी थीं और सड़ती लाशों की बदबू फैली थी। हर किसी की कोशिश किसी तरह सीमा पार पहुंचने की थी। कठिन सफर के बाद परिवार फाजिल्का पहुंचा, फिर अबोहर होते हुए सूरतगढ़ आया। पिता डिंगा सिंह ने विपरीत परिस्थितियों में परिवार को संभाला और नई जगह पर जिंदगी फिर शुरू की। 79 साल बाद भी वह सफर यादों में जिंदा है।