
उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव 2027 का औपचारिक ऐलान होने में भले ही अभी देर है, लेकिन इसके लिए कमर कस कर सभी पार्टियां अभी से मैदान में उतर चुकी हैं। पिछले कई चुनावों की तरह यह चुनाव भी सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण कांग्रेस के लिए रहने वाला है। कांग्रेस जमीन पर अपनी स्थिति मजबूत नहीं कर पाई है। वह अपने दम पर चुनाव लड़ने और बेहतर प्रदर्शन करने लायक स्थिति नहीं बना पाई है। उसे सपा की मदद लेनी ही होगी।
वैसे 2022 के विधान सभा चुनाव में दोनों पार्टियां अलग लड़ी थीं। यह कांग्रेस के लिए नुकसानदेह, लेकिन सपा के लिए फायदेमंद रहा था। लेकिन, 2024 के लोक सभा चुनाव में सपा-कांग्रेस ने गठबंधन किया और इसका नतीजा अच्छा रहा था। कांग्रेस के करीब एक-तिहाई उम्मीदवार (17 में 6) जीते थे। इस गठबंधन में सपा का पलड़ा भारी रहा। आज भी कांग्रेस की तुलना में सपा का पलड़ा भारी है। यह एक नहीं, अनेक कारणों से है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि कांग्रेस को सपा की ज्यादा जरूरत है।
सपा के जमीनी कार्यकर्ता कांग्रेस की तुलना में ज्यादा सक्रिय और समर्पित हैं। कांग्रेस के पास समर्पित कार्यकर्ताओं की तो कमी है ही, राज्य में कोई ऐसा नेता भी नहीं है जिनकी पूरे राज्य में अपील हो। राष्ट्रीय स्तर पर भी राहुल गांधी ही हैं, जिनकी सभाओं में भीड़ जुटती है। लेकिन भीड़ वोट में नहीं बदल पाती। यह पिछले कई चुनावों के नतीजों से भी समझा जा सकता है।
| दल (Party) | 2007 चुनाव में सीटें | 2012 चुनाव में सीटें | 2017 चुनाव में सीटें | 2022चुनाव में सीटें |
| भारतीय जनता पार्टी (BJP) | 51 | 47 | 312 | 255 |
| समाजवादी पार्टी (SP) | 97 | 224 | 47 | 111 |
| बहुजन समाज पार्टी (BSP) | 206 | 80 | 19 | 1 |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) | 22 | 28 | 7 | 2 |
| अपना दल (सोनेलाल) (ADAL / ADS) | 0 | 0 | 9 | 12 |
| राष्ट्रीय लोक दल (RLD) | 10 | 9 | 1 | 8 |
| सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) | 0 | 0 | 4 | 6 |
| निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल (NISHAD) | - | - | 1 | 6 |
| जनसत्ता दल लोकतांत्रिक (JDL) | - | - | - | 2 |
| कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI/CPI-M) | 0 | 0 | 0 | 0 |
| अन्य एवं निर्दलीय (Others & Independents) | 17 | 15 | 3 | 0 |
| कुल सीटें (Total Seats) | 403 | 403 | 403 | 403 |
यूपी का चुनाव अब त्रिकोणीय या बहुकोणीय मुक़ाबले वाला चुनाव नहीं रह गया है। चुनाव में मुक़ाबला बीजेपी और सपा की अगुआई वाले गठबंधनों के बीच ही होना है। बसपा कहीं मुक़ाबले में नहीं रह गई है। ऐसे में सत्ता विरोधी लहर का फायदा सपा को ही मिलना है।
कांग्रेस नरेटिव बनाने के मामले में भी सपा से पीछे है। सपा के मुखिया अखिलेश यादव ने 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नया फार्मूला देकर सामाजिक समीकरण साधने का एक नया नरेटिव बनाने की कोशिश की है, लेकिन कांग्रेस के पास ऐसा कोई नरेटिव नहीं है। राहुल गांधी यूपी में भी वही मुद्दे उठाते हैं, जो 'दिल्ली' या देश के बाकी हिस्सों में उठाते हैं। ये राष्ट्रीय मुद्दे लोगों को स्थानीय स्तर पर पार्टी से जोड़ नहीं पाते।
2024 के लोक सभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में बीजेपी का जो हाल हुआ, उसे देखते हुए सपा और कांग्रेस, दोनों की उम्मीदें इस बार निश्चित रूप से बढ़ी होंगी। 2024 में यूपी से बीजेपी के सांसदों की संख्या 62 से गिर कर 33 पर जा पहुंची थी। यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता कि लोक सभा चुनाव के समय वाले फैक्टर बीजेपी के लिए विधान सभा चुनाव में भी काम करेंगे, लेकिन अगर किया तो इसका ज्यादा फायदा सपा को ही मिलेगा। लोक सभा चुनाव में भी फायदा सपा को ही मिला था। पहली बार उसके 37 उम्मीदवार जीते। कांग्रेस को भी छह सीटें मिली थीं, जो 2009 के बाद उसका सबसे अच्छा प्रदर्शन रहा था।
हालांकि, 2017 के विधान सभा चुनाव में सपा-कांग्रेस का गठबंधन काम नहीं किया था। तब सपा को 47 और कांग्रेस को केवल सात सीटें मिली थीं। लेकिन, 2022 में जब दोनों पार्टियां अलग-अलग लड़ीं तो सपा को 111 और कांग्रेस को महज दो सीटें मिली थीं।
बसपा की हालत अच्छी नहीं है। इस समय उसका एक भी सांसद (लोक सभा में) या विधायक नहीं है। उसके नुकसान का सबसे ज्यादा फायदा बीजेपी को हुआ है, फिर सपा और उसके बाद कांग्रेस को। इस लिहाज से भी सपा ही कांग्रेस के लिए जरूरी है।