
Teachers' Day: शिक्षक दिवस पर देशभर में शिक्षक के समर्पण और सेवा को याद किया जा रहा है। लेकिन सुकमा के नाड़ीगुफा गांव में शिक्षक हर दिन अपनी जान जोखिम में डालकर कर्तव्य निभा रहे हैं। शबरी नदी के बीच बसे इस गांव में बारिश के दिनों में स्कूल तक पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं है। गांव पहुंचने के लिए शिक्षकों को तेज बहाव वाली शबरी नदी छोटी डोंगी से पार करनी पड़ती है। नदी में बहकर आने वाले पेड़-पौधे और झाडिय़ां इस सफर को और खतरनाक बना देते हैं।
कई बार नाव झाड़ियों में फंसकर पलट चुकी है। तैरना आता था, इसलिए शिक्षक किसी तरह नदी से बाहर निकलकर अपनी जान बचा पाए। इसके बावजूद बच्चों की पढ़ाई न रुके, इसलिए अगले दिन फिर उसी नदी को पार कर स्कूल पहुंचते हैं। जिला मुख्यालय से करीब 12 किमी दूर रामाराम ग्राम पंचायत का आश्रित गांव नाड़ीगुफा शबरी नदी के बीच बसा है। बारिश में जलस्तर बढ़ते ही गांव लगभग टापू में बदल जाता है। करीब चार महीने तक आवागमन प्रभावित रहता है। ग्रामीणों के साथ शिक्षकों के लिए भी नदी पार करना रोज की मजबूरी बन जाता है।
वर्तमान में कक्षा पहली से आठवीं तक 16 बच्चे पढ़ रहे हैं। चौथी कक्षा तक की पढ़ाई नाड़ीगुफा में होती है, पांचवीं से आठवीं तक के बच्चे की पढ़ाई पातासुकमा में होती है।
शिक्षकों के मुताबिक वर्तमान में उपलब्ध नाव काफी छोटी है। बारिश में शबरी का बहाव तेज होने के कारण इसे संभालना मुश्किल हो जाता है। नदी के बीच मौजूद झाडिय़ों और पेड़ों के बीच से नाव निकालनी पड़ती है। इसी दौरान कई बार नाव फंसकर पलट चुकी है। शिक्षक राजू बघेल ने बताया कि नाड़ीगुफा के पास शबरी नदी दो धाराओं में बंट जाती है और करीब दो किलोमीटर आगे जाकर फिर मिलती है। खतरा बना रहता है।
शिक्षक मंतूराम मौर्य ने बताया कि जलस्तर बढऩे पर छोटी नाव से नदी पार करना बेहद जोखिम भरा हो जाता है। बड़ी और सुरक्षित नाव उपलब्ध होने से शिक्षकों और ग्रामीणों दोनों को राहत मिलेगी। शिक्षकों ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से सुरक्षित नाव उपलब्ध कराने की मांग की है। उनका कहना है कि स्थायी समाधान के लिए नदी पर पुल निर्माण जरूरी है।
नाड़ीगुफा प्राथमिक शाला की स्वीकृति वर्ष 2005 और माध्यमिक शाला की स्वीकृति 2006 में हुई थी। करीब दो दशक तक स्कूल का संचालन नदी के इस पार पातासुकमा गांव में होता रहा। पिछले शिक्षा सत्र में तत्कालीन बीईओ और बीआरसी की पहल पर स्कूल को नाड़ीगुफा में संचालित करने की व्यवस्था की गई। गांव में अतिरिक्त कक्ष बनाकर पढ़ाई शुरू हुई।