
सूरत।निगोद से सिद्ध अवस्था तक का सार द्वादशांग ग्रंथ में है। पंडित दौलतराम ने इसको छ:ढाला में सरल शब्दों में वर्णित किया है। यह बात डॉ. संजीवकुमार गोधा ने बुधवार को परवत पाटिया में मॉडलटाउन के श्रीचंद्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर के पास प्रांगण में प्रवचन के दौरान कही।
उन्होंने कहा कि इसमें प्रत्येक जीव की कहानी है। चारों गति के परिभ्रमण का वर्णन है। दुख की परिभाषा आकुलता है, जिसने अपने स्वरूप को नहीं पहचाना, वह संसार में दुखी है। आत्मा के चैतन्य स्वरूप को पहचानने वाला सुखी है। दुख का मूल अपने-आपको भूलना है। दुख का कारण परिस्थिति नहीं, बल्कि सच्चे ज्ञान को समझने की कमी है। देवलोक में अपार सुख है, लेकिन सम्यग् दर्शन देवों के पास भी नही है। बीच-बीच में वक्ता ने हे गुरुवर शाश्वत सुखदर्शक, यह नग्न स्वरूप तुम्हारा है...आदि भजनों से श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। उन्होंने कहा कि जैन दर्शन का सार यही है कि पहले समझो, फिर श्रद्धा रखों और उसके बाद प्रवृत्ति करो। आयोजक परिवार दीवान ब्रदर्स के विद्याप्रकाश दीवान ने बताया कि सुबह पूजन विधान का आयोजन किया गया। उसके बाद सुमनप्रसाद और शुद्धात्मप्रभा तड़ैया के प्रवचन हुए। शाम को पं. प्रदीप झांझरी और रात को डॉ. हुक्मीचंद भारिल्ल ने आत्मा-परमात्मा पर वक्तव्य दिए।
प्रतिज्ञा भंग करना महापाप
सकल दिगम्बर जैन समाज की ओर से आयोजित समयसार विधान मंडल और निजात्म कल्याण शिविर में डॉ. संजीवकुमार गोधा ने प्रतिज्ञा की व्याख्या करते हुए कहा कि प्रतिज्ञा को भंग करना महापाप है। दूसरे के देखा-देखी प्रतिज्ञा नहीं करें, बल्कि स्वयं की शारीरिक, पारिवारिक और भविष्य की अनुकूलता समझकर प्रतिज्ञा ली जानी चाहिए, ताकि उसका सही ढंग से पालन किया जा सके।
हिंसा का मूल कारण राग
जयपुर से आए अंतरराष्ट्रीय स्तर के वक्ता डॉ. हुक्मीचंद भारिल्ल ने अहिंसा...भगवान महावीर की दृष्टि में विषय पर विशेष प्रवचन दिए। उन्होंने कहा कि सम्पूर्ण विश्व में जितनी भी हिंसा होती है, उसका मूल कारण राग (चाह) है । जर, जोरू और जमीन के राग में सदियों से तलवारें चलती आई हैं। जैन धर्म इसे रोकने के लिए राग के शमन की बात करता है। जिस दुर्भावना के कारण हिंसा होती है, उसके कारण अर्थात राग को ही नष्ट कर दो तो बाहर की हिंसा अपने आप रुक जाएगी और सर्वत्र शांति होगी। जैन दर्शन में चाह दु:ख का कारण है और उसके विपरीत वीतरागता से अहिंसा प्रकट होती है। वीतराग होने के लिए सदग्रंथ का स्वाध्याय आवश्यक है।