सूरत

पालघर की जनता ही बताएगी किसमें-कितना है दम

लोकसभा उप चुनाव में दांव पर भाजपा-शिवसेना की प्रतिष्ठा, चुनाव से राजनीतिक गठबंधन के भविष्य की दिशा भी होगी तय...
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Updated: 26 May 2018, 7:41 PM IST
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पालघर की जनता ही बताएगी किसमें-कितना है दम

पालघर (महाराष्ट्र). महाराष्ट्र में मिलकर सरकार चला रही भाजपा और शिवसेना में से राजनीति के धरातल पर कौन-कितना भारी है, इसका सच पालघर लोकसभा उप चुनाव के 28 मई को आने वाले नतीजों में सामने आ जाएगा। पिछले साल भाजपा से अलग होकर चुनाव लड़ने की घोषणा करने के बाद शिवसेना ने अपनी ताकत का अहसास पालघर में करा दिया है। इतना ही नहीं, जिस तरह से भाजपा के खिलाफ देश में गठबंधन की राजनीति चल पड़ी है, उसका 'लिट्मस टेस्ट' भी इस चुनाव के परिणाम से हो जाएगा।

इधर, मायानगरी मुंबई से सटे होने के बावजूद इस अनुसूचित जनजाति संसदीय सीट में विकास के रंग दूर-दूर दिखाई नहीं देते। यहां की 17 लाख आबादी मूलभूत सुविधाआें को पाने के लिए जूझ रही है। आदिवासी कल्याण के दावे भी हवाई दिखाई देते हैं। किसान और मछुआरे मौजूदा सरकार से गुहार लगा-लगा कर थक गए, पर उनकी मांगों पर कभी गंभीरता से विचार नहीं किया गया। कुछ हुआ तो बुलेट ट्रेन और एक्सप्रेस हाइवे के नाम पर ऐसी परियोजनाओं को थोपने का काम, जो उनके लिए परिणाम ही घातक लेकर आएंगी।

संसदीय क्षेत्र में छह विधानसभाएं हैं, जिसमें वसई, बोईसर और नालासोपारा पर बहुजन विकास अघाडी पार्टी का दबदबा है तो दहानू और विक्रमगढ़ में भाजपा का। सिर्फ पालघर विधानसभा सीट पर शिवसेना का कब्जा है। ऐसे में भाजपा और शिवसेना के बीच छिड़ी जंग का सबसे बड़ा फायदा किसी को मिल सकता है तो वह है बहुजन विकास अघाडी को। पिछले चुनाव में भी भाजपा के दिवंगत सांसद चिंतामणि वनगा की जीत के बाद बहुजन विकास अघाडी का उम्मीदवार दूसरे नम्बर पर रहा था। शिवसेना ने वनगा के पुत्र श्रीनिवास को अपना उम्मीदवार बनाया है तो भाजपा ने कांग्रेस से आए राजेन्द्र गावित पर जीत का दांव खेला है। कांग्रेस ने दामोदर शिंगडा का चुनाव मैदान में उतारा है, पर जीत की दौड़ में वे पीछे दिखाई देते हैं। एक और रोचक बात इस चुनाव की यह है कि भाजपा और शिवसेना दोनों ही एक-दूसरे को चुनाव में अपना प्रतिद्वंद्वी नहीं बता रहे हैं।

निर्णायक मतदाता हैं उत्तर भारतीय


संसदीय क्षेत्र की करीब 22 फीसद आबादी उत्तर भारतीयों की है। इनके वोट सभी दलों के लिए निर्णायक साबित होंगे। ऐसे में भाजपा और शिवसेना ने हिन्दीभाषी मतदाताओं को रिझाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। नालासोपरा, वसई और विरार में उत्तर प्रदेश, बिहार आदि क्षेत्रों के स्टार प्रचारकों को मतदान के दिन तक सक्रिय कर रखा है। आपको बता दें कि पालघर क्षेत्र उत्तर मुंबई संसदीय सीट से मिलता है, जिसका प्रतिनिधित्व राम नाईक कर चुके हैं जो अभी उत्तर प्रदेश के राज्यपाल हैं।

विधानसभा उप चुनाव हारे थे भाजपा उम्मीदवार


दो वर्ष पूर्व पालघर विधानसभा उपचुनाव में शिवसेना उम्मीदवार अमित घोडा जीते थे। उन्होंने कांग्रेस के राजेंद्र गावित को हराया था, जो लोकसभा उप चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार हैं। वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में अमित के पिता कृष्ण घोडा यहां से जीते थे, लेकिन दो साल बाद उनका निधन हो गया था।

चुनाव के दौरान ही क्यों आई याद


क्षेत्र की जनता की मानें तो मुख्यमंत्री को उप चुनाव के दौरान ही उनकी याद आई। गत २० मई को हुई चुनावी सभा में उन्होंने आदिवासियों का खावटी कर्ज माफ करने, मेडिकल कॉलेज खोलने और वसई-विरार महानगरपालिका क्षेत्र से हरित पट्टे के २९ गांवों को अलग करने की घोषणा की। हालांकि कांग्रेस ने इसे आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन बताकर चुनाव आयोग में शिकायत भी दर्ज करा दी।



फडनवीस के लिए भी बड़ी चुनौती


उप चुनाव में शिवसेना ने अपना उम्मीदवार खड़ा करके सीधे-सीधे मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस को चुनौती दी है। हालांकि इसी साल अक्टूबर में वे अपने कार्यकाल के चार वर्ष पूरा करेंगे जो विरोधियों के लिए साफ इशारा है कि उन्होंने न केवल अपनी कुर्सी को बचाकर रखा बल्कि हर चुनौतियों से पार पाने में सफलता भी प्राप्त की। इधर, भाजपा और शिवसेना के बीच पड़ी दरार का लाभ बहुजन विकास अघाडी के उम्मीदवार बलिराम जाधव को मिल सकता है। २०१४ में भाजपा के चिंतामन वनगा से हारे जाधव ने ही उनको २००९ में हराया था।

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