टीकमगढ़. केन-बेतवा ङ्क्षलक परियोजना से भले ही समूचे बुंदेलखंड को ङ्क्षसचित करने की बात कही जा रही है, लेकिन हकीकत यह है कि इस योजना से आधे जिले को भी लाभ मिलता नहीं दिखाई दे रहा है। इस योजना के तहत नहरों से आने वाले पानी से जिले के महज 132 गांवों में पानी पहुंचेगा, जबकि शेष जिले की कृषि भूमि अब भी मानसून पर आश्रित रहेगी। इसके लिए जनप्रतिनिधियों के साथ ही विभाग प्रयास करने की बात तो कह रहा है, लेकिन अब तक कोई सफलता मिलती नहीं दिखाई दे रही है।
शेष गांवों तक पानी पहुंचाने करने होंगे प्रयास, जिले की 1.50 लाख हेक्टेयर जमीन अब भी मानसून के भरोसे
टीकमगढ़. केन-बेतवा ङ्क्षलक परियोजना से भले ही समूचे बुंदेलखंड को ङ्क्षसचित करने की बात कही जा रही है, लेकिन हकीकत यह है कि इस योजना से आधे जिले को भी लाभ मिलता नहीं दिखाई दे रहा है। इस योजना के तहत नहरों से आने वाले पानी से जिले के महज 132 गांवों में पानी पहुंचेगा, जबकि शेष जिले की कृषि भूमि अब भी मानसून पर आश्रित रहेगी। इसके लिए जनप्रतिनिधियों के साथ ही विभाग प्रयास करने की बात तो कह रहा है, लेकिन अब तक कोई सफलता मिलती नहीं दिखाई दे रही है।
जिले में 2.5 लाख हैक्टेयर भूमि कृषि योग्य है। इस जमीन को ङ्क्षसचित करने की जिम्मेदारी जिले के 107 तालाबों के साथ ही बान सुजारा बांध एवं हरपुरा नहर पर है। बान सुजारा बांध से जहां जिले की 75 हजार हैक्टेयर जमीन को ङ्क्षसचित करने की बात कही जाती है तो हरपुरा नहर से 3 हजार हैक्टेयर और जिले के तालाबों से 25 से 30 हजार हैक्टेयर में ङ्क्षसचाई होना बताया जाता है। शेष जमीन अब भी निजी कुओं पर आश्रित है और मानसून ठीक न होने पर किसानों को जमीनें खाली छोडऩी पड़ती है। खेतों तक पानी न पहुंचने की सबसे बड़ी समस्या पलायन के रूप में सामने आती है।
मिल रहा आश्वासन
इस वृहद योजना से शेष जिले के तालाबों को जोडऩे के लिए सांसद के साथ ही विधायक एवं अन्य जनप्रतिनिधि सरकार से बात कर पत्राचार तो कर रहे हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आ सका है। विभाग भी पूरा आश्वासन दे रहा है कि योजना के शुरू होने के बाद इसका विस्तार होगा, लेकिन अब तक की स्थिति में यह संभव होता नहीं दिखाई दे रहा है। वहीं लोगों का कहना है कि इस प्रकार की बड़ी योजनाएं बार-बार नहीं बनती हैं। ऐसे में सभी को इसके लिए सामूहिक प्रयास करने चाहिए, ताकि पूरा जिला ङ्क्षसचित हो सके।
नहीं पहुंच रही केन-बेतवा
इस सूखे क्षेत्र को ङ्क्षसचित करने के लिए केन-बेतवा ङ्क्षलक परियोजना भी पहुंचती नहीं दिखाई दे रही है। विदित हो कि बान सुजारा बांध की नहरों से बल्देवगढ़ के बाद सबसे ज्यादा लाभ जतारा, पलेरा और खरगापुर क्षेत्र को है। वहीं केन-बेतवा ङ्क्षलक परियोजना से भी सबसे ज्यादा लाभ जतारा को है। इस योजना में जतारा के 121 गांव शामिल हैं। शेष गांव पलेरा और खरगापुर के बताए जा रहे हैं। ऐसे में शेष जिले में केन-बेतवा के बाद भी सूखा बना रहेगा।
इनका कहना है
&शेष जिले के तालाबों को जोडऩे की मांग लगातार की जा रही है। इसके लिए विभाग के उच्चाधिकारियों को जानकारी दी गई है। शासन स्तर से ही इसके लिए निर्णय लिया जाएगा।
- रजनीश तिवारी, एसडीओ, केन-बेतवा लिंक परियोजना, टीकमगढ़।