
रमेश सैनी
पचेवर. देश सहित अन्य जिलों में आज भी अलग अलग तरिके से कई त्योहार अपने-अपने ढंग से मनाते हैं, जिन्हें देखने व सुनने से आज के युवा काफी उत्साहित हो जाते हैं। होली के दूसरे दिन ऐसा ही त्योहार टोंक जिले के नगर गांव में आज भी अपनी मर्यादा को कायम मानते हुए महिलाएं व पुरुष धूम धाम से धूलंड़ी मनाते हैं।
जहां पर आस पास के युवाओं व बुजुर्ग अपने रिश्तदारों के साथ देखने के लिए नगर गांव से तीन किलोमीटर दूर चामुण्डा माता के परिसर में पहुंचते हैं, जहां पर मेला लगता हैं। मेले में मणिहारों सहित मिठाइयों की दुकाने लगती हैं। वहीं चामुंण्डा माता के दर्शन कर खुशहाली की कामना करते हैं।
दोपहर बाद अलग-अलग माताजी परिसर में मेले का आनन्द लेते हुए सभी समाज के लोग दोपहर बाद सामुहिक रूप से बैठकर समाज सुधार के बारे चर्चा करते हुए शराब बंदी, बाल विवाह, ब्रह्मभोज प्रथा बंद करने जैसे कई निर्णय लेते हैं।
गांव में महिलाओं का राज
कस्बे के सभी लोग गांव के बाहर जाने के बाद सभी महिलाएं चौराहे पर रंग के कड़ाव भर कर रखती हैं। जहां पर बिना लोक लाज के अलग अलग वेश भूषा सांग कर दिन भर गीत गाती हुई महिलाएं आपस में खेलने का लुफ्त उठाती हैं। दिन अस्त तक महिलाएं रंग गुलाल से खेलती रहती हैं। दिन अस्त होने के साथ ही ग्रामीण गांव में प्रवेश करते हैं।
दम हैं तो आए महिलाओं के बीच
गांव में यह भी रिवाज है कि अगर कोई पुरुष बिना कोडों की मार खाए बगैर महिलाओं के कड़ाव में से रंग की बाल्टी भर कर ले आए तो उसे दमदार मानते हैं। कड़ाव के चारों ओर महिलाओं का झूण्ड हाथों में कोडे लिए खड़ी रहती हैं। पुरुषों को कड़ाव के पास जाने पर कोडों की मार झेलनी पड़ती हैं। जहां से कोडे मारती हुई महिलाएं पुरुष को गांव के बहार भगा देती हैं।
बुजुर्गों की जुबानी परम्परा
जन्म से ही देख रहे हैं 70 वर्षीय बुजुर्ग भरत सिंह ने बताया की जब से में समझदार हुआ हूं जब से यह परम्परा देख रहा हूं। जो आज भी कायम हैं। राजपूत शासन से चली आ रही हैं परम्परा 78 वर्षीय भंवर सिंह ने बताया कि हमारे बुजर्गो ने बताया था कि राजपूत शासन से ही यह रिवाज चलता आ रहा हैं नगर के राजा द्वारा लिया गया निर्णय यह हैं कि एक वर्ष में एक दिन महिलाओं का भी राज होना चाहिए। जिससे महिलाएं भी इस रंग के त्योहार को खेलकर यादगार बना सकें। जब से ही यह परम्परा चलती आ रही हैं।
#khulkekheloholi