
आवां. शहीद दिवस के पूर्व दिवस पर कस्बेे में 1965 के भारत-पाक युद्ध में मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राणों का बलिदान करने वाले शहीद नारायण बलाई की तस्वीर पर श्रद्धा सुमन अदा कर उनकी शहादत को याद किया। इस दौरान लोगों ने कहा कि आज भी जब सरहद पर गोलियां चलती हैं तो हर युवा की भुजाएं शहीद नारायण की तरह कुछ कर गुजरने को फडकऩे लगती है। इस बीच सरंपच राधेश्याम चन्देल ने वीरांगना नन्दू देवी का सम्मान किया गया है।
इस मौके पर नन्दू देवी ने कहा कि उसे 16 सितम्बर 1965 का दिन आज भी याद है, जब पाक सैनिकों से लोहा लेते हुए उसके पति का सीना गोलियों से छलनी हो गया था। शादी के चन्द वर्ष बाद ही मांग का सिन्दूर मिटने से उसका जीवन अनेक तकलीफों से गुजरा है, पर उसने हार नहीं मानी। सीआर दुर्लभ चन्द जैन व उपसरपंच शान्ति लाल जैन ने बताया कि सैनिक कल्याण विभाग व जिला कलक्टर की ओर से शहीदों की प्रतिमाएं स्थापित करने के लिए कार्रवाई की जा रही है।उल्लेखनीय है कि वेद मलिक ने 16 दिसम्बर 1999 को शहीद नारायण की शहादत को सर्वोच्च बलिदान का प्रमाण-पत्र देकर वीरांगना का मान बढ़ाया।
मिल रहा है सम्मान
वीरांगना नन्दू देवी को गांव,घर-परिवार में तो आदर मिला ही है। सरकार ओर जिला कलक्टर की ओर से स्वतन्त्रता और गणतन्त्र दिवस पर उनका अभिनन्दन किया जाता रहा है। विगत दिनों राज्य सैनिक कल्याण सलाकार समिति के अध्यक्ष पे्रमसिंह बाजौर ने आवां पंचायत में नन्दू देवी के लिए सम्मान समारोह आयोजित कर शहीद के उत्सर्ग की यादें ताजा की।
प्रतिमा होगी स्थापित
सरपंच चन्देल व पंचायत समिति सदस्य जैन ने बताया कि पंचायत क्षेत्र मे जल्द ही शहीद की प्रतिमा स्थापित की जाएगी। इसके लिए सरकार की ओर से भूमि आवंटित करने के लिए पत्र मिला है।आवां के तेजाजी के चौक में बनने वाले पार्क में शहीद नारायण की मूर्ति लगाने की मांग पर ग्राम सभा में निर्णय पारित किया जाएगा।
इसी प्रकार शहीद दिवस पर टोडा का गोठड़ा पंचायत के बेनपा में भी जश्न का माहौल है। विद्यालय प्रशासन की ओर से शहीद नायक बिरदी चन्द गुर्जर की वीरांगना मोत्या देवी का सम्मान कर सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए। संस्था प्रधान राधाकिशन मीना ने बताया कि नायक बिरदी चन्द ने मणिपुर की 77वीं बटालिन में उग्रवादियों के खिलाफ चलाए ऑपरेशन में जान पर खेल कर दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए। उनकी शहादत की बदौलत उग्रवादियों को मैदान छोड़ भागना पड़ा।
इस दौरान शाला परिवार और ग्रामीणों की ओर से शहीद की वीरांगना मोत्या देवी का सम्मान किया गया है। इधर, मोत्या का कहना है 29 अक्टूबर 1997 को उसके पति के देश के लिए कुर्बानी देने से वो गौरान्वित महसूस कर रही है।