
टोंक. जिले की अंतिम सीमा पर पम्पासागर तालाब की गोद में बसा पचेवर गांव की अलग ही झलक देखकर सेलानी भी अभिभूत हो जाते हैं। पचेवर में देखने के लिए हरियाली के साथ छतरियां, तालाब व गांव में बने कच्चे-पक्के मकानों सहित ग्रामीण वेशभूषा अलग ही छठा बिखेरती हैं। जहां पर बाहर से आने वाले सेलानी पचेवर गढ़ सहित आस पास घूमकर मोहित हो जाते हैं। तथा तालाब में रोजाना सैकड़ो ग्रामीण नहाने के साथ ही मन्दिरों में पूजा अर्चना करते हुए नजर आते हैं। अल सुबह चार बजे श्रद्वालुओं द्वारा रामधुनी के साथ कस्बे के चारों घूमते है। कस्बे के बुजुर्ग बताते है कि एक हजार पूर्व महाराजा केशर सिंह ने पचेवर गांव बसाया था। बताया जाता है कि पचेवर के चारों दिशा में पांच पीरों की समाधी स्थल हैं, जो दिलेगर, नाडीवाले, झरमलिया,नागाजी व सबसे ऊंची बसावट पर आज भी मस्त दरबार के नाम से पांच पीर होने के कारण पचेवर नाम रखा। गांव में आज हर प्रकार की आवश्यक सुविधा हैं, लेकिन बरोजगारी के कारण आज के युवा पिछड़ रहे हैं। यहां पर जैन, ब्राह्मण, जाट, माली, गुर्जर, तेली, रैगर, मुस्लिम, बैरवा सहित सभी प्रकार के जाति के लोग रहते हैं। पूर्व में यहां शिक्षा का जुड़ाव बहुत कम था। आज कस्बे में सरकारी व गैर सरकारी विद्यालय हैं। जहां शिक्षा के प्रति सभी समाज जागरूक हैं तथा बालक बालिकाओं को उच्च शिक्षा प्रदान कराने की होड़ सी लगी रहती हैं। कस्बे में हर वर्ष गणेशजी व तेजाजी का मेला लगता हैं। जहां पर आस पास के ग्रामीण महिलाएं व पुरुष मेला देखने के लिए आते हैं। कस्बे में नगर, आवड़ा, पारली, किरावल, सांस, कुराड़ व मलिकपुर, बाछेड़ा के ग्रामीण आकर खरीदारी करते हैं तथा कस्बे के चारों ओर एक दर्जन से अधिक गांव ढाणिया के ग्रामीण दैनिक जीवन की उपयोगी सामग्री खरीदने आते हैं। पचेवर बस स्टेण्ड से जयपुर, अजमेर, दूदू, मालपुरा व टोंक के लिए रोडवेज बसे संचालित होती हैं।